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ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

121   22   121   22   121   22


कभी-कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना
मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना

बिना तुम्हारे  ये ज़िन्दगी अब  कटेगी कैसे
जो तू नहीं तो नफ़स की डोरी भी तोड़ देना

जरा  सी कोई  रहे  हरारत  न जान  बाकी
कि  जाते जाते  बदन  हमारा निचोड़ देना

कभी हमारे ग़मों पे तुझको भी प्यार आये
वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना

तेरे ग़मो का उसे न होगा पता, है मुमकिन
मगर सिरा 'ब्रज' उदासियों का न जोड़ देना

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' 30 minutes ago

इसके अलावा चौथे शे'र में "भी प्यार" की जगह नया शब्द "दुलार" रखता हूँ जिसका अर्थ प्यार स्नेह ही होता है।इससे मात्रा पतन की जरूरत भी नही पड़ेगी।सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' 35 minutes ago

आदरणीय अमीरुद्दीन जी विस्तार से बताने के लिए आपका अत्यंत आभारी हूँ।उला को 

अगर कभी जो करार आये झिंझोड़ देना...करता हूँ।क्योंकि सानी में मेरी और मुझे रखना ज्यादा जम रहा।

देखिये "अगर कभी जो करार आये झिंझोड़ देना

            मेरी उदासी मुझे अकेला न छोड़ देना.....बताइयेगा सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' 4 hours ago

//लेकिन जो मतला अभी है उसमें कोई कमी है??दरअसल मौजूदा स्थिति में मुझे रवानगी ज्यादा समझ मे आ रही।//

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी, हर शे'र में शाइर का अपना नज़रिया होता है, मतले के ऊला मिसरे में अगर आप का नज़रिया ये है कि मुझे बेक़रारी में रह रह कर बार बार क़रार आ सकता है तो आपका "कभी-कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना" कहना सही है। लेकिन अगर नज़रिया ये है कि ग़म और बेक़रारी की शिद्दत इतनी है कि शायद ही कुछ पलों के लिए क़रार आ सकता है तो "मुझे कभी जो क़रार आये झिंझोड़ देना" कहना सही होगा। सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' 5 hours ago

आदरणीय अमीरुद्दीन जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित एवं इस्लाह के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया...आपका दोनों सुझाव बेहद खूबसूरत हैं।लेकिन जो मतला अभी है उसमें कोई कमी है??दरअसल मौजूदा स्थिति में मुझे रवानगी ज्यादा समझ मे आ रही।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' yesterday

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें।

'कभी-कभी जो क़रार आये झिझोड़ देना

 मेरी उदासी मुझे अकेला न छोड़ देना'      इस शे'र को यूँ कहें -

'मुझे कभी जो क़रार आये झिंझोड़ देना

मेरी उदासी युँ ही अकेला न छोड़ देना'   

'कभी हमारे ग़मों पे तुझको भी प्यार आये'   इस मिसरे मेंं 'भी' की जगह जो करने से रब्त आयेगा।    सादर। 

वहीं उसी पल कतार भावों की मोड़ देना'

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday

सादर आभार आदरणीय धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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