For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"आंटी जी, अगर उस दिन आप ने शिंदो के सर पर हाथ न रखा होता तो पता नहीं ये कहाँ होती।" रज्जो ने कहा

कीमत तो इसकी  पहले ही लग चुकी थी,बस उस दिन तो पैसे देने थे, मालिक को ।

 शिंदो को तो इस बारे कुछ पता ही नही था।“भला हो उस के साथ डांस पार्टी में काम करने वाली का”,रज्जो ने बात बढ़ाते हुए कहा।

"उसने बता दिया,वरना पता नहीं कहाँ कहाँ बिक गई चुकी होती, अब तक  ।

जब मालिक ने कहा कि कल वह किसी और डांस पार्टी के साथ काम करेगी " तब उसे खनक गई थी,कि इस के आगे़ क्या होने वाला है।

"तब शिंदो को मैं आप के पास ले आई,मुझे बस यही अच्छा लगा,क्यूँ ?

आंटी जी, ठीक किया  मैने "

“घर तो पहले ही छूट चुका था,अमली पती ने निकाल घर से निकाल दिया था , कि उस नए छोड़ दिया , इस का फैसला भी वह नही कर सका  था.

 माँ बाप तो पहले ही  किनारा कर चुके थे, बच्चे  के साथ जाती भी तो कहाँ ?”रज्जो ने उसे पास बुलाते  हुए कहा।

"चलो कोई नहीं, अब शिंदो,  तुम आंटी के पास हो, चाय पी और भूल जा सब कुछ।

फिर शिन्दों का ध्यान शेल्फ़ पे रखी गुरु जी की तस्वीरों पर पड़ा और उनके आगे उस  नमन किया  l मगर जिस काम के लिए रज्जो ने उसे यहाँ मनाया था, उसने इस   काम को  तो पहले ही  न कर दी, मगर फिर उसे लगा, अगर कोई और काम उसे  कोई न देगा तो , अगर पहले जैसा मिल गया ..... l इसी सोच में वह गुम थी .

माँ बाप के घर वह जा नहीं सकती थी l

इस लिए उस ने अनमने मन से आंटी का कहा मान लिया l मगर शिंदो के मन में पता नहीं क्या क्या चल रहा था? शिंदो ने अभी चाय का कप रखा तो  बाहर इक मोटर साईकल आ कर रुकी। " रज्जो, गाहक आ गया, शिंदो को भेज दो।"आवाज़ ने कहा

उस के अंदर जाते ही इक तरफ का दरवाज़ा बंद हो गया ,  उसे लगा जैसे जिंदगी की सोच के सभी दरवाजे बंद  हो गए हों  ।

मगर अचानक सोच का दरवाज़ा खुला, वह  बैठक बिस्तरे की तरफ जाने की बिजाए  बाहर जाने वाले दरवाज़े से जाती हुई ,  दरवाज़े को ज़ोर से बंद कर गई।

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

Views: 451

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Deepalee Thakur on October 14, 2020 at 4:22pm
लघुकथा का अच्छा प्रयास ,थोड़ी और कसावट से निखर जाएगी, सुझाव मात्र ।
Comment by Samar kabeer on October 14, 2020 at 11:43am

जनाब मोहन बेगोवाल जी आदाब, लघुकथा का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
21 hours ago
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service