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उफ़ ! क्या किया ये तुम ने, वफ़ा को भुला दिया,  

उस शख़्स ए बावफ़ा को, कहो क्या सिला दिया।

  

जो ले के जाँ, हथेली पे, हरदम रहा खड़ा, 

तुम ने उसी को, ज़ह्र का, प्याला पिला दिया।

अब क्या भला, किसी पे कोई, जाँ निसार दे, 

जब अपने ख़ूँ ने, ख़ून का, रिश्ता भुला दिया।

गुलशन की जिस ने तेरे, सदा देखभाल की,

उस बाग़बां का तू ने, नशेमन जला दिया।

गर वो मिलेंगे हम से, कभी पूछ लेंगे हम, 

क्यूँ ख़ाक़ में हमारा, भरोसा मिला दिया। 

अब क्या भला किसी पे, करें ऐतबार हम, 

अपने ही हमनफ़स ने, यक़ीं को हिला दिया। 

मुश्किल 'अमीर' ये है, कि हम, भूल जाते हैं, 

उस ने भले ही पीठ पे, ख़ंजर चला दिया।

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 28, 2020 at 1:39pm

जी मुहतरम, इस्लाह के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।  मतला 'उफ़ क्या किया ये तुमने वफ़ा को भुला दिया

                                                                               उस शख़्स-ए-बावफ़ा को नज़र से गिरा दिया'

करने से "आ" की मात्रा क़ाफ़िया हो जाता है और रदीफ़ "दिया"। बग़ैर तरमीम क्या "भुला, सिला, मिला, पिला, जला, हिला" को क़वाफी़ और "दिया" को रदीफ़ माना जाना ग़लत होगा ? रहबरी फ़रमाकर मशकूर फ़रमाएं । सादर। 

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 11:56am

//मैंने ये ग़ज़ल नहीं नज़्म कही है। क्या बतौर नज़्म ये रचना सहीह है? //

जी,नहीं ये नज़्म की श्रेणी में नहीं आएगी,मतला यूँ कर लें तो बाक़ी अशआर चल जाएँगे:-

'उफ़ क्या किया ये तुमने वफ़ा को भुला दिया

उस शख़्स-ए-बावफ़ा को नज़र से गिरा दिया'

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 28, 2020 at 9:26am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी, रचना पर आपकी उपस्थिति और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 8:07am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 27, 2020 at 12:46pm

जनाब समर कबीर साहिब, आदाब । ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और तनक़ीद ओ इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया। वैसे मैं लिखना भूल गया था मैं ने ये ग़ज़ल नहीं नज़्म कही है। क्या बतौर नज़्म ये रचना सहीह है?  मेहरबानी फरमाकर अपने क़ीमती नज़रिए से रौशनास फरमाएं। 

Comment by Samar kabeer on May 27, 2020 at 12:13pm

जनाब अमीरुद्दीन ख़ान 'अमीर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन क़वाफ़ी ग़लत हैं,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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