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Shashiprakash saini's Blog (13)

मांगो वत्स क्या मांगते हो

रात स्वप्न में, प्रभु थे खड़े

बोले मांगो वत्स क्या मांगते हो

जमीं चाहते हो या आस्मां चाहते हो

बड़ी गाडी बड़ा घर नोटों की गट्ठर

या सत्ता सुख कुर्सी से हो कर

जो चाहो अभी दे दूँ

एक नयी ज़िन्दगी दे दूँ

मैंने माँगा तो क्या माँगा

एक बेंच पुरानीं सी

वो पीछे वाली मेरे स्कूल की

चाहिए मुझे

वो बचपन के ज़माने

दोस्त पुराने

मदन के डोसे पे टूटना

चेतन का वो टिफिन लूटना

अपना टिफिन बचाने में

टीचर…

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Added by shashiprakash saini on July 23, 2013 at 11:00am — 7 Comments

तेरे साथ की जरुरत है

तन की नक्काशी कही धोखा ना देदे

मन से पुकारे की एक आवाज की जरुरत है

साथ तेरे चलने से जले या ना जले दुनिया

पर क़यामत तक चले की तेरे साथ की जरुरत है

 

 

झुर्रियाँ बाल सफ़ेद

सब उम्र के फरेब

तन…

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Added by shashiprakash saini on March 10, 2012 at 2:00am — 7 Comments

ये आज का युवा हैं

आंधी हैं हवा हैं

बंधनों में क्या हैं

ये उफनता दरिया हैं  

किनारे तोड़ निकला हैं

मस्ती में मस्तमौला हैं

मुश्किल में हौसला हैं

अपनी पे आजाए तो जलजला हैं

ये आज का युवा हैं

 

कभी बेफिक्री का धुआँ हैं

कभी पानी का बुलबुला हैं

कभी संजीदगी से भरा हैं

ये आज का युवा हैं

पंखों को फडफडाता हैं

पेडों पे घोंसला बनाता है

अब की उड़ना ये चाहता हैं

दाव पे ज़िंदगी लगता हैं

हारा भी…

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Added by shashiprakash saini on February 5, 2012 at 12:22am — 8 Comments

कोयलिया जब गाती है

चल झूठ रूठना है तेरा

आंखें सब बतलातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

आँखों से अब ना आस गिरा

बातों पे रख विश्वास जरा

जाने दे मत रोक मुझें

सर पे दुनियां दारी है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

न तू भूलीं न मैं भुला

जब झूलें थे सावन झुला

मौसम अब के बरसातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

चलतें थे तट पे साथ प्रिये

नटखट हाथों में हाथ…

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Added by shashiprakash saini on January 19, 2012 at 4:00am — 2 Comments

छन्न पकैया , मेहनत की है रोटी

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी से प्रभावित होकर मैंने भी  छन्न पकैया  में  कुछ लिखने का प्रयास किया है. मेरी मूल रचना में कुछ कमियाँ थी जो योगराज जी ने सुधारी, योगराज सर आपका बहोत बहोत शुक्रिया. वरिष्टजनों का मार्गदर्शन चाहूँगा !

 

.

छन्न पकैया , छन्न पकैया , मेहनत की है रोटी,

कहने को युवराज है, लेकिन बाते छोटी-छोटी ||१||

.

छन्न पकैया, छन्न पकैया , खूब बड़ी महंगाई

कुर्सी पे हाकिम जो बैठा , शुतुरमुर्ग है भाई…

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Added by shashiprakash saini on January 4, 2012 at 2:30pm — 17 Comments

सवाल करता बहुत देता उसे कोई जवाब नहीं



सवाल करता बहुत देता उसे कोई जवाब नहीं 

पढ़े कैसे वो दुनिया ने दी उसे कोई किताब नहीं



स्कूल की खिडकियों पे लगाए  कान सुनता है 

अगर अन्दर पनपते फूल क्या वो गुलाब नहीं 



जूठे बर्तन धोते हुए पूरा बचपन बिताता है 

लोग…

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Added by shashiprakash saini on January 2, 2012 at 12:00am — 6 Comments

तेरा अक्स मेरे अक्स से कितना मिलता है

तेरा अक्स मेरे अक्स से कितना मिलता है

जो आइने हमने बनाए है वो अलग बात कहे

पर उसकी तस्वीर में तुभी मुझसा दीखता है

तेरा अक्स मेरे अक्स से कितना मिलता है

 

वो अपने नियम शख्स दर शख्स नहीं बदलता है

उसके तराजू में सब एकसा तुलता है

भेद करे तो करे कैसे वो

न तो उसको तन दीखता है

न धन दीखता है

उसके दर्पण में बस मन…

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Added by shashiprakash saini on January 1, 2012 at 1:00pm — 2 Comments

नये है रंग

नये है रंग

रुत है नयी तस्वीर बनाने की

नये साज़ नयी आवाज़ में

कुछ नयी धुन गुनगुनाने की

नयी सुबह है नये सूरज के जगमगाने की

खठी मीठी यादे पीछे छोड़ आने की

नयी उम्मीद नई आशाएं जगाने की

जो बीता उसे सम्मान से विदा करे

और नये बरस के स्वागत में दीप जलाने की

लौ से शोला और शोलो से लपटों में बदल जाने की

दिलो से दूरियाँ  मिटाने की

बस यही गीत गुनगुनाने की

:शशिप्रकाश सैनी

Added by shashiprakash saini on December 31, 2011 at 10:00am — No Comments

अपनी गलतियों का बोझ आप ही ढोता हूँ

अपनी गलतियों का भोझ आप ही  ढोता हूँ

गंगा खुद मैली है मै वहा पाप नही धोता हूँ


पाप धोने के लिए बहुत है  आंख के  आसू
रात रो अंतर्मन पश्चाताप से ही भिगोता…
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Added by shashiprakash saini on December 31, 2011 at 3:00am — No Comments

अंधेरा है कितना

रातो के हो गए है पुजारी

कि दिन की खबर नहीं है

पैसे की है ये दुनिया

मेरा ये शहर नहीं है

दिन में भी ये जलाते है बत्तियाँ इतना

ना जाने यहाँ अंधेरा है कितना

आदमी अपने साये पे भी शक करता है

हाथ हाथ मिलाने से डरता है



पैसो से हर चीज तोलने लगा हूँ

की मै भी पैसो की जुबा बोलने लगा हूँ

नीद बेचता हू बेचता हू सासे भी

बेचे है त्यौहार बेचीं है उदासी भी

हसी बेचीं है…

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Added by shashiprakash saini on December 30, 2011 at 8:00pm — 2 Comments

ये ख़ासियत रही उस मुलाक़ात की

ये ख़ासियत रही उस मुलाक़ात की

जुबा कुछ कह न सकी आँखों ने सब बात की

 

ये दुनिया है सब पैसे से चलते है

खबर लेता नहीं कोई बिगड़े हालात की

 

जो करते है लडकियों पे छीटा-कसी

न जाने किस घर के है उपज है किस ख़यालात की

 

हमसे रूठी है यु बात भी करती नहीं

नाराज़गी है न जाने किस रात की

 

किस गम में भीगी है छत की सीढ़ियां "सैनी"

किसके जज़्बात छलके किस आंख ने इतनी बरसात की

 

: शशिप्रकाश…

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Added by shashiprakash saini on December 30, 2011 at 11:00am — 1 Comment

मुखौटा हटाओ

भीड़ में सब मुखौटे है 

इंसा कहा है

जिसकी सूरत पे सीरत दिखे 

वो चेहरा कहा है



खिड़किया यु बंद करली है

की हम खोलते ही नहीं

दुनिया से करते है बात

पडोसियो से बोलते ही नहीं 

न बगल में खुशी न मातम का पता 

पर ये मालूम दुनिया में क्या घटा 





कमरे बंद रखने से सिर्फ सडन होगी

खिडकिया खोलोगे तो हवा…

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Added by shashiprakash saini on December 29, 2011 at 10:29am — No Comments

मै चलने के लिए बना था मै उड़ न सका

रुकना साँस लेना मेरी ज़रूरत थी
जब भी मै रुका
दुनिया ने कहदिया मै पीछें रह गया
मै चलने के लिए बना था
वो कहते रहे मै उड़ न सका
 
विचार बीज थे
मै मिट्टी था
दुनिया से अलग सोचता
मै मिट्टी था
बारिश की बूदों पड़े तो मै खुशबू
सूरज की रोशनी में जादू
की विचारों में जिंदगी भर दू
उपजाऊ था
पर था तो मै मिट्टी ही
कइयो ने…
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Added by shashiprakash saini on December 29, 2011 at 8:42am — 8 Comments

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