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Sushil Sarna's Blog (879)

दोहा सप्तक. . . . नेता

दोहा सप्तक. . . . नेता

संसद में लो शोर का, शुरू हुआ नव सत्र ।

आरोपों की फैलती, बौछारें सर्वत्र ।।

अपशब्दों से गूँजता, अब संसद का सत्र ।

परिणामों से पूर्व ही, फाड़े जाते पत्र ।।

पावन मन्दिर देश का, संसद होता मित्र ।

नेता लड़ कर देश का, धूमिल करते चित्र ।।

कितने ही वादे करें, नेता चाहे आज ।

नग्न नयन के स्वप्न तो, टूटें बिन आवाज । ।

संसद में नेता करें, बात -बात पर तर्क ।

जनता की हर आस का, होता बेड़ा गर्क ।।

नेताओं के पास कब ,…

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Added by Sushil Sarna on July 31, 2024 at 2:19pm — No Comments

दोहा पंचक . . . वक्त

दोहा पंचक. . . . वक्त

हर करवट में वक्त की,छिपी हुई है सीख ।

आ जाए जो वक्त तो, राजा मांगे भीख ।।

डर के रहना वक्त से, ये शूलों का ताज ।

इसकी लाठी तो सदा, होती बे-आवाज ।।

पल भर की देता नहीं, वक्त किसी को भीख ।

अन्तिम पल की वक्त में , गुम हो जाती चीख ।।

बिना वक्त मिलता नहीं, किस्मत का भी साथ ।

कभी पहुँच कर लक्ष्य पर , लौटें खाली हाथ ।।

सुख - दुख सब संसार में, रहें वक्त  आधीन  ।

काल पाश में  आदमी, लगता कितना दीन…

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Added by Sushil Sarna on July 29, 2024 at 1:30pm — 6 Comments

दोहा अष्टम. . . . प्रश्न

दोहा अष्टम ......प्रश्न

उत्तर   सारे   मौन   हैं,  प्रश्न   सभी   वाचाल ।

किसने जानी आज तक,भला काल की चाल ।।

यह   जीवन   तो   शून्य  का, आभासी है रूप ।

पग - पग पर संघर्ष की, फैली तीखी धूप ।।

तोड़ सको तो तोड़ दो, प्रश्नों का हर जाल ।

यह जीवन तो पूछता, हरदम नया सवाल ।।

हर मोड़ पर जिंदगी, पूछे एक सवाल ।

क्या पाने की होड़ में, जीवन दिया निकाल ।।

फिसला जाता रेत सा, जीवन जरा संभाल ।

क्या जानें किस मोड़ पर, मिले अचानक काल ।।

बहुतेरे…

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Added by Sushil Sarna on July 25, 2024 at 3:31pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . मेघ

दोहा पंचक. . . . . मेघ

हाथ जोड़ विनती करे, हलधर बारम्बार।

धरती की जलधर सुनो, अब तो करुण पुकार।।

अवनी से क्यों रुष्ट हो, जलधर बोलो आज ।

हलधर बैठा सोच में, कैसे उगे  अनाज ।।

अम्बर के हर मेघ में, हलधर की है आस ।

बिन जलधर कैसे मिटे, तृषित धरा की प्यास ।।

सावन में अठखेलियाँ, नभ में करे पयोद ।

धरा तरसती वृष्टि को, मेघा करते मोद ।।

श्वेत हंस की टोलियाँ, नभ में उड़े स्वछंद ।

धूप - छाँव का हो रहा, ज्योँ आपस में द्वन्द्व…

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Added by Sushil Sarna on July 22, 2024 at 12:50pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

बात- बात पर आदमी ,बदले रंग हजार ।

गिरगिट सोचे क्या करूँ, अब  इसका  उपचार ।।

गिरगिट माँगे ईश से, रंगों का अधिकार ।

लूट लिए इंसान ने, उसके रंग अपार ।।

गिरगिट तो संसार में, व्यर्थ हुई बदनाम ।

रंग बदलना आजकल, इंसानों का काम ।।

गिरगिट बदले रंग जब , भय का हो आभास।

मानव बदले रंग जब, छलना हो विश्वास ।।

शायद अब यह हो गया, गिरगिट को आभास ।

नहीं सुरक्षित आजकल, इंसानों में वास ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on July 16, 2024 at 8:30pm — 3 Comments

दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि

दोहा सप्तक : इच्छा ,कामना, चाह  आदि

मानव मन संसार में, इच्छाओं का दास ।

और -और की चाह में, निस-दिन बढ़ती प्यास ।1।

इच्छा हो जो बलवती, सध जाता हर काम ।

चर्चा  उसके नाम की, गूँजे आठों याम ।2।

व्यवधानों की लक्ष्य में, जो करते परवाह ।

क्षीण लगे उद्देश्य में, उनके मन की चाह ।3।

अन्तर्मन की कामना, छूने की आकाश ।

सम्भव है यह भी अगर, होवें नहीं हताश ।4।

परिलक्षित संसार में, होता वो परिणाम ।

इच्छा के अनुरूप…

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Added by Sushil Sarna on July 5, 2024 at 8:30pm — 8 Comments

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दृग जल हाथों पर गिरा, टूटा हर अहसास ।

काया  ढलते ही लगा, सब कुछ था आभास ।।1

जीवन पीछे रह गया, छूट गए मधुमास ।

जर्जर काया क्या हुई, टूट गई हर  आस ।।2

लार गिरी परिधान पर, शोर हुआ घनघोर ।

काया पर चलता नहीं, जरा काल में जोर ।।3

लघु शंका बस में नहीं, थर- थर काँपे हाथ ।

जरा काल में खून ही , छोड़ चला फिर साथ ।।4

अपने स्वर्णिम काल को ,मुड़-मुड़ देखें नैन ।

जीवन फिसला रेत सा, काटे कटे न रैन ।।5

सूखा रहता…

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Added by Sushil Sarna on July 3, 2024 at 2:00pm — No Comments

दोहे आज के. . . .

दोहे आज के .....

बिगड़े हुए समाज का, बोलो दोषी कौन ।

संस्कारों के ह्रास पर, आखिर हम क्यों मौन ।।

संस्कारों को आजकल, भला पूछता कौन ।

नंगेपन  के प्रश्न पर,  आखिर हम क्यों मौन ।।

नर -नारी के मध्य अब, नहीं शरम की रेख ।

खुलेआम अभिसार का, देख तमाशा देख ।।

सरेआम अब हो रहा, काम दृष्टि का खेल ।

युवा वर्ग में आम अब, हुआ अधर का मेल ।।

सभी तमाशा देखते, कौन करे प्रतिरोध ।

कल के बिगड़े रंग का, नहीं किसी को बोध ।।

कर में कर को थाम कर, चले…

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Added by Sushil Sarna on June 27, 2024 at 9:27pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . सच-झूठ

दोहे सप्तक . . . . . सच-झूठ



अभिव्यक्ति सच की लगे, जैसे नंगा तार ।

सफल वही जो झूठ का, करता है व्यापार ।।

झूठों के बाजार में, सत्य खड़ा लाचार ।

असली की साँसें घुटें, आडम्बर भरमार ।।

आकर्षक है झूठ का, चकाचौंध संसार ।

निश्चित लेकिन झूठ की, किस्मत में है हार ।।

सच के आँगन में उगी, अविश्वास की घास ।

उठा दिया है झूठ ने, सच पर से विश्वास ।।

झूठ जगाता आस को, सच लगता आभास ।

मरीचिका में झूठ की, सिर्फ प्यास ही प्यास ।।

सत्य पुष्प पर झूठ…

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Added by Sushil Sarna on June 18, 2024 at 9:13pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .सागर

दोहा पंचक. . . सागर

उठते हैं जब गर्भ से, सागर के तूफान ।

मिट जाते हैं रेत में, लहरों के अरमान ।।

लहर- लहर में  रेत पर, मचलें सौ अरमान ।

मौन तटों पर प्रेम की, रह जाती पहचान ।।

छलकी आँखें देख कर, सूना सागर तीर ।

किसके  अश्कों ने  किया, खारा सागर नीर ।।

कौन बनाता है भला, सागर तीर मकान ।

अरमानों को लीलता,  इसका हर तूफान ।।

देखा पीछे पर कहाँ, जाने गए निशान ।

हर वादे को दे गया, घाव एक तूफान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on June 10, 2024 at 1:00pm — 6 Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

रिश्ते नकली फूल से, देते नहीं सुगंध ।

अर्थ रार में खो  गए, आपस के संबंध ।।

रिश्तों के माधुर्य में, आने लगी खटास ।

मिलने की  ओझल हुई, संबंधों में प्यास ।।

गैरों से रिश्ते बने, अपनों से हैं दूर ।

खून खून से अब हुआ, मिलने से मजबूर ।।

झूठी हैं अनुभूतियाँ , कृत्रिम हुई मिठास ।

रिश्तों को आते नहीं, अब रिश्ते ही रास ।।

आँगन में खिंचने लगी, नफरत की दीवार ।

रिश्तों की गरिमा…

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Added by Sushil Sarna on June 7, 2024 at 8:30pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .दम्भ

दोहा पंचक. . . . . दम्भ

हर दम्भी के दम्भ का, सूरज होता अस्त ।

रावण जैसे सूरमा, होते देखे पस्त । ।

दम्भी को मिलता नहीं, जीवन में सम्मान ।

दम्भ कुचलता जिंदगी, की असली पहचान ।।

हर दम्भी को दम्भ की, लगे सुहानी नाद ।

इसके मद में चूर वो, बन जाता सैयाद ।।

दम्भ शूल व्यक्तित्व का, इसका नहीं निदान ।

आडम्बर के खोल में, जीता वो इंसान ।।

दम्भी करता स्वयं का, सदा स्वयं अभिषेक ।

मैं- मैं को जीता सदा, अपना हरे…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:56pm — No Comments

दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . रिश्ते

आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।

मिटें जरा सी चूक से, रिश्ते सब  अनमोल ।।

शंका से रिश्ते सभी, हो जाते बीमार ।

संबंधों में बेवजह,  आती विकट दरार ।।

रिश्ता रेशम सूत सा, चटक चोट से जाय ।

कालान्तर में वेदना,  इसकी भुला न पाय ।।

बंधन रिश्तों के सभी,  आज हुए कमजोर ।

ओझल मिलने के हुए, आँखों से अब छोर ।।

रिश्तों में अब स्वार्थ का, जलता रहता दीप ।

दुर्गंधित से नीर में, खाली मुक्ता से सीप ।।

संबंधों को…

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Added by Sushil Sarna on May 8, 2024 at 1:42pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . 

झोला  लेकर  हाथ  में, चले  अनोखे  लाल ।
भाव  देख  बाजार  के, बिगड़े  उनके  हाल ।
बिगड़े  उनके हाल ,करें क्या  आखिर  भाई ।
महंगाई  का    काल , खा   गया   पाई- पाई ।
कठिन दौर से  त्रस्त , अनोखे दर- दर डोला ।
लौटा   लेकर  साथ , अंत  में  खाली  झोला ।

सुशील सरना /7-5-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on May 7, 2024 at 8:28pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .मजदूर

दोहा पंचक. . . . मजदूर

वक्त  बिता कर देखिए, मजदूरों के साथ ।

गीला रहता स्वेद से , हरदम उनका माथ ।।

सभी दिवस मजदूर के, जाते एक समान ।

दिन बीते निर्माण में, शाम क्षुधा का गान ।।

याद किया मजदूर के, स्वेद बिंदु को आज ।

उसकी ही पहचान है, , विश्व धरोहर ताज ।।

स्वेद बूँद मजदूर की, श्रम का है अभिलेख ।

हाथों में उसके नहीं , सुख की कोई रेख ।।

रोज भोर मजदूर की, होती एक समान ।

उदर क्षुधा से नित्य ही, लड़ती उसकी जान…

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Added by Sushil Sarna on May 1, 2024 at 4:30pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .पुष्प - अलि

दोहा पंचक. . . . पुष्प -अलि

गंध चुराने आ गए, कलियों के चितचोर ।

कली -कली से प्रेम की, अलिकुल बाँधे डोर ।।

अलिकुल की गुंजार से, सुमन हुए भयभीत ।

गंध चुराने आ गए, छलिया बन कर मीत ।।

आशिक भौंरे दिलजले, कलियों के शौकीन ।

क्षुधा मिटा कर दे गए, घाव  उन्हें संगीन ।।

पुष्प मधुप का सृष्टि में, रिश्ता बड़ा अजीब ।

दोनों के इस प्रेम को, लाती गंध करीब ।।

पुष्प दलों को भा गई, अलिकुल की गुंजार ।

मौन समर्पण कर…

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Added by Sushil Sarna on April 27, 2024 at 1:51pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक  . . . .

( अपवाद के चलते उर्दू शब्दों में नुक्ते नहीं लगाये गये  )

टूटे प्यालों में नहीं, रुकती कभी शराब ।

कब जुड़ते है भोर में, पलक सलोने ख्वाब ।।

मयखाने सा नूर है, बदन अब्र की बर्क ।

दो जिस्मों की साँस का, मिटा वस्ल में फर्क ।।

प्याले छलके बज्म में, मचला ख्वाबी नूर ।

निभा रहे थे लब वहीं, बोसों का दस्तूर ।।

महफिल में मदहोशियाँ, इश्क नशे में चूर ।

परवाने को देखकर , हुस्न हुआ मगरूर…

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Added by Sushil Sarna on April 24, 2024 at 5:37pm — 2 Comments

दोहा दशम. . . . रोटी

दोहा दशम . . . . . . रोटी

कैसे- कैसे रोटियाँ, दिखलाती हैं  रंग ।

रोटी से बढ़कर नहीं,इस जीवन में जंग ।।

रोटी के संघर्ष में, जीवन जाता बीत ।

अर्थ चक्र में गूँजता , रोटी का संगीत ।।

रोटी का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।

बिन रोटी के बीतता ,हर पल जैसे कल्प ।।

रोटी से बढ़कर नहीं, दुनिया में कुछ यार ।

इसके  आगे दौलतें , इस जग की बेकार ।।

दो रोटी ने दोस्तो , क्या - क्या दिये अजाब ।

मुफलिस की तकदीर का, रोटी…

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Added by Sushil Sarna on April 20, 2024 at 2:11pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .प्रेम

दोहा पंचक. . . . प्रेम

अधरों पर विचरित करे, प्रथम प्रणय आनन्द ।

चिर जीवित अभिसार का, रहे मिलन मकरंद ।।

खूब हुआ अभिसार में, देह- देह का द्वन्द्व ।

जाने कितने प्रेम के, लिख डाले फिर छन्द ।।

मदन भाव झंकृत हुए, बढ़े प्रणय के वेग ।

अधरों के बैराग को, मिला अधर का नेग ।।

धीरे-धीरे रैन का , बढ़ने लगा प्रभाव ।

मौन चरम अभिसार के, मन में जले अलाव ।।

नैन समझते नैन के, अनबोले स्वीकार ।

स्पर्शों के दौर में, दम…

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Added by Sushil Sarna on March 23, 2024 at 2:45pm — 4 Comments

कुंडलिया .... गौरैया

कुंडलिया - गौरैया

गौरैया  को   देखने, हम  आ  बैठे  द्वार ।
गौरैया के  झुंड  का, सुंदर   सा   संसार ।
सुंदर लगे संसार , धरा पर  दाना  खाती ।
लेकर तिनके साथ, घोंसला खूब बनाती ।
कह ' सरना ' कविराय, धूप में ढूँढे छैया ।
उसको  उड़ते  देख, कहें  री आ  गौरैया ।

सुशील सरना / 21-3-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on March 21, 2024 at 4:00pm — 4 Comments

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