For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Sushil Sarna's Blog (902)

स्मृति पृष्ठ ...

स्मृति पृष्ठ ...

रजनी के

श्यामल कपोलों पर

मेघों की बूंदों ने

व्यथित यादों के

पृष्ठों पर जैसे

सान्तवना का

आभासीय श्रृंगार कर डाला

दृग कलशों से

सजल वेदना

प्रीत की

पराकाष्ठा को

चेहरे की लकीरों में

शोभित करती रही

प्राण और देह में

जीवन संघर्ष चलता रहा

किसी को विस्मरण करने के

सभी उपचार

रेत की भित्ति से

ढह गए

थके नयन

आशा क्षणों की

गहन कंदराओं में…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 9, 2017 at 3:59pm — 13 Comments

बोझ ...(250 वीं रचना )

बोझ ...

हम

कहाँ जान पाते हैं

चेतन या अवचेतन में

अटकी हुई कुंठाओं की

मूक भाषा को

उनींदी सी अवस्था में

कुछ सिमटी हुई

आशाओं को

मन में उबलते

एक असीमित बोझ की

पहचान को

साँसों की थकान

अश्रु की व्यथा

और

रुदन के आह्वान को

तुम्हारे

स्पर्श की अनुभूति में लिप्त

क्षणों की

परिणिती के आभास ने

यूँ तो

अंजाने संताप से

मुक्ति का ढाढस दिया

किन्तु…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 4, 2017 at 4:59pm — 12 Comments

गर्व ....

गर्व ....

रोक सको तो

रोक लो

अपने हाथों से

बहते लहू को

मुझे तुम

कोमल पौधा समझ

जड़ से उखाड़

फेंक देना चाहते थे

मेरे जिस्म के

काँटों में उलझ

तुमने स्वयं ही

अपने हाथ

लहू से रंग डाले

बदलते समय को

तुम नहीं पहचान पाए

शर्म आती है

तुम्हारे पुरुषत्व पर

वो अबला तो

कब की सबला

बन चुकी ही

जिसे कल का पुरुष

अपनी दासी

भोग्या का नाम देता था

देखो

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

यकीं के बाम पे ...



यकीं के बाम पे ...

हो जाता है

सब कुछ फ़ना

जब जिस्म

ख़ाक नशीं

हो जाता है

गलत है

मेरे नदीम

न मैं वहम हूँ

न तुम वहम हो

बावज़ूद

ज़िस्मानी हस्ती के

खाकनशीं होने पर भी

वज़ूद रूह का

क़ायनात के

ज़र्रे ज़र्रे में

ज़िंदा रहता है

ज़िंदगी तो

उन्स का नाम है

बे-जिस्म होने के बाद भी

रूहों में

इश्क का अलाव

फ़िज़ाओं की धड़कनों में

ज़िंदा रहता है

लम्हे मुहब्बत…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 2:05pm — 7 Comments

क़ैद रहा ...

क़ैद रहा ...

वादा
अल्फ़ाज़ की क़बा में
क़ैद रहा

किरदार
लम्हों की क़बा में
क़ैद रहा

प्यार
नज़र की क़बा में
क़ैद रहा

इश्क
धड़कनों की क़बा में
क़ैद रहा

कश्ती
ढूंढती रही
किनारों को
तूफ़ां
शब् की क़बा में
क़ैद रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 25, 2017 at 5:00pm — 11 Comments

बेशर्मी से ... (क्षणिका )...

बेशर्मी से ... (क्षणिका )

अन्धकार
चीख उठा
स्पर्शों के चरम
गंधहीन हो गए
जब
पवन की थपकी से
इक दिया
बुझते बुझते
बेशर्मी से
जल उठा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 22, 2017 at 8:49pm — 11 Comments

कलियों का रुदन ....

कलियों का रुदन   .... 

रात भर

कलियों का रुदन होता रहा

उनके अश्रु

ओस कणों में

परिवर्तित हो गए

पर तुम

उनके अंतर्मन की वेदना से

अनभिज्ञ रहे भानु

उनकी सिसकियाँ

सन्नाटों में

तुम्हें पुकारती रहीं

मगर तुम न सुन सके

आहों के वेग से

तुम

अनभिज्ञ रहे भानु

सच तुम

बहुत निष्ठुर हो

भला

तुम्हारे रश्मि दूत भी कहीं

उनके मूक बंधन के

कारण का निवारण बन

सकते…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 20, 2017 at 5:39pm — 2 Comments

बस चला जा रहा हूँ...

बस चला जा रहा हूँ ...

मैं

समय के हाथ पर

चलता हुआ

गहन और निस्पंद एकांत में

तुम्हारे संकेत को

हृदय की

गहन कंदराओं में

अपने अंतर् के

चक्षुओं में समेटे

बस चला जा रहा हूँ

मैं

समय के हाथ पर

मधुरतम क्षणों का आभास

स्वयं का

अबोले संकेत में

विलय का विशवास

अपने अंतर् के

चक्षुओं में समेटे

बस चला जा रहा हूँ

मैं

समय के हाथ पर

वाह्य जगत के

कल ,आज और कल के

भेद…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 15, 2017 at 7:16pm — 12 Comments

अभिलाषाओं के ...

अभिलाषाओं के   ... 

थक जाते हैं

कदम

ग्रीष्म ऋतु की ऊषणता से

मगर

तप्ती राहें

कहाँ थकती हैं



अभिलाषाओं की तृषा

पल पल

हर पल

ग्रीष्म की ऊषणता को

धत्ता देती

अपने पूर्ण वेग से

बढ़ती रहती है

ज़िंदगी

सिर्फ़ छाँव की

अमानत नहीं

उस पर

धूप का भी अधिकार है

जाने क्यूँ

धूप का यथार्थ

जीव को स्वीकार्य नहीं



भ्रम की छाया में

यथार्थ के निवाले

भूल जाता है…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 14, 2017 at 3:44pm — 4 Comments

लम्हों की कैद में .....

लम्हों की कैद में ......



लम्हे

जो शिलाओं पे गुजारे

पाषाण हो गए



स्पर्श

कम्पित देह के

विरह-निशा के

प्राण हो गए



शशांक

अवसन्न सा

मूक दर्शक बना

झील की सतह पर बैठ

काल की निष्ठुरता

देखता रहा



वो

देखता रहा

शिलाओं पर झरे हुए

स्वप्न पराग कणों को



वो

देखता रहा

संयोग वियोग की घाटियों में

विलीन होती

पगडंडियों को

जिनपर

मधुपलों की सुधियाँ

अबोली श्वासों…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 12, 2017 at 6:00pm — 6 Comments

मैं चुप रही.....

मैं चुप रही ....

रात के पिछले पहर

पलकों की शाखाओं पर

कुछ कोपलें

ख़्वाबों की उग आई थीं

याद है तुम्हें

तुम ने

चुपके से

मेरे ख्वाबों की

कुछ कोपलें

चुराई थीं

मैं चुप रही

तुमने

अपने स्पर्श से

उनमें बैचैनी का

सैलाब भर दिया

मैं चुप रही

तुमने

मेरी पलकों की

शाखाओं पर

अपने अधरों से

सुप्त तृष्णा को

जागृत किया

मैं चुप रही

रात की उम्र

ढलती रही…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 5, 2017 at 5:50pm — 14 Comments

व्यर्थ है......

व्यर्थ है......

व्यर्थ है

कुछ भी कहना

बस

मौन रहकर

देखते रहो

दुनिया को

तमाशाई नज़रों से

पूरे दिन

व्यर्थ है

कुछ भी सुनना

अर्थहीन शब्दों के

कोलाहल में

भटकते भावों की

तरलता में लुप्त

संवेदना के

स्पंदन को

व्यर्थ है

कुछ भी ढूंढना

इस नश्वर संसार में

आदि और अंत का

भेद पाने के लिए

स्वयं में

स्वयं से

मिलने का

प्रयास करना …

Continue

Added by Sushil Sarna on April 5, 2017 at 3:30pm — 8 Comments

ख़्वाब ...

ख़्वाब ...

नींद से आगे की मंज़िल

भला

कौन देख पाया है

बस

टूटे हुए ख़्वाबों की

बिखरी हुई

किर्चियाँ हैं

अफ़सुर्दा सी राहें हैं

सहर का ख़ौफ़ है

सिर्फ

मोड़ ही मोड़ हैं



न शब् के साथ

न सहर के बाद

कौन जान पाया है

कब आता है

कब चला जाता है

ज़िस्म की

रगों में

हकीकत सा बहता है

अर्श और फ़र्श का

फ़र्क मिटा जाता है

सहर से पहले

जीता है

सहर से पहले ही

मर जाता है…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 27, 2017 at 7:06pm — 5 Comments

सुकून .......

सुकून .......

ढूंढता हूँ

अपने सुकून को

स्वयं की

गहराईयों में

छुपे हैं जहां

न जाने

कितने ही

जन्मों के जज़ीरे

अंधे -अक़ीदे

तसव्वुर में तैरते 

कुछ धुंधले से

साये

साँसों के मोहताज़

अधूरी तिश्नगी के

कुछ लम्हे

ज़िस्म पर आहट देते

ख़ौफ़ज़दा

कुछ लम्स



खो के रह गया हूँ मैं

ग़ुमशुदा दौर के शानों पर ग़ुम

अपने सुकून को ढूंढते ढूंढते

क्या

कर सकूंगा…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 23, 2017 at 10:00pm — 4 Comments

ई-मौजी ...

ई-मौजी ...

आज के दौर में

क्या हम ई-मौजी वाले

स्टीकर नहीं हो गए ?

भावहीन चेहरे हैं

संवेदनाएं

मृतप्रायः सी जीवित है



अब अश्क

अविरल नहीं बहते

शून्य संवेदनाओं ने

उन्हीं भी

बिन बहे जीना

सिखा दिया है

हर मौसम में

सम भाव से

जीने का

करीना सिखा दिया है

अब कहकहा

ई-मौजी वाली

मुस्कान का नाम है

ई-मौजी सा ग़म है

ई-मौजी से चहरे हैं

ई-मौजी से…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 21, 2017 at 5:30pm — 8 Comments

एक शब्द ....

एक शब्द ....

एक शब्द टूट गया

एक शब्द रूठ गया

एक शब्द खो गया

एक शब्द सो गया

एक शब्द आस था

एक शब्द उदास था

एक शब्द देह था

एक शब्द अदेह था

एक शब्द में अगन थी

एक शब्द में लगन थी

एक शब्द जनम था

एक शब्द मरण था

एक शब्द प्यास था

एक शब्द मधुमास था

एक शब्द चन्दन था

एक शब्द क्रंदन था

एक शब्द मोह था

एक शब्द विछोह था



शब्दों की भीड़ थी

हर शब्द में पीर थी

नीर था शब्दों में

शब्द शब्द…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 19, 2017 at 4:20pm — 8 Comments

यादें......

यादें......

यादें !

आज पर भारी

बीते कल की बातें

वर्तमान को अतीत करती

कुछ गहरी कुछ हल्की

धुंधलके में खोई

वो बिछुड़ी मुलाकातें

हाँ !

यही तो हैं यादें

ये भीड़ में तन्हाई का

अहसास कराती हैं

आँखों से अश्कों की

बरसात कराती हैं

सफर की हर चुभन

याद दिलाती हैं

जब भी आती हैं

ज़ख़्म कुरेद जाती हैं

अहसासों के शानों पर

ये कहकहे लगाती हैं

ज़हन की तारीकियों में…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 18, 2017 at 9:30pm — 6 Comments

चला गया ...

चला गया ...

हवा 

शयन कक्ष के परदों से

खेलती रही

टेबल पर पड़ी मैग्ज़ीन के पन्ने

वायु वेग से

बार बार

फड़फड़ाते रहे

तन्हा से पड़े

काफी के मग

खाली होते हुए भी

अपने में

बहुत कुछ समेटे थे

समेटे थे

अपने अंदर

अकेलेपन से बातें करते

वो क्षण

जो काफी के मग को

अधरों से लगाए

कनखियों से निहारते हुए 

आँखों ने आँखों में

बिताये थे

समेटे थे…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 15, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

पावन हो …….

पावन हो …….



सुना था

मतलब के लिए

जमीनों और घरों के

बंटवारे हो जाते हैं

इस धन लोलुप दुनिया में

जीते जी

जिन्दा रिश्तों के

बंटवारे हो जाते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

इंसान के जहाँ में

इंसानों के बंटवारे हो जाते हैं

मगर ये क्या

आज अखबार के

एक कालम ने

दिल को द्रवित कर दिया

अपने को श्रवण कुमार

साबित करने के लिए

अपने मृत जन्म दाता को

श्रद्धान्जली देने के लिए

अखबार में अलग अलग विज्ञापन दे दिये…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 7, 2017 at 9:08pm — 10 Comments

दर्द के निशाँ ....

दर्द के निशाँ ....

दर

खुला रहा

तमाम शब

किसी के

इंतज़ार में

पलकें

खुली रहीं

तमाम शब्

किसी के

इंतज़ार में

कान

बैचैन रहे

तमाम शब्

तारीकियों में ग़ुम

किसी की

आहटों के

इंतज़ार में

शब्

करती रही

इंतज़ार

तमाम शब्

वस्ले-सहर का

मगर

वाह रे ऊपर वाले

वस्ल से पहले ही

तू

ज़ीस्त को

इंतज़ार का हासिल

बता देता है

मंज़िल से पहले…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 3, 2017 at 1:39pm — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service