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Rahul Dangi Panchal's Blog – December 2014 Archive (5)

गजल - कि तब जाके सुदर्शन को पडा मुझको उठाना था!

1222 1222 1222 1222



मेरी कुछ भी न गलती थी मगर दुश्मन जमाना था!

जमाने को मुझे मुजरिम का यह चोला उढ़ाना था!!



मेरे हाथों में बन्दूकें कहाँ थी दोस्त मेरे तब!

मैं तो बच्चों का टीचर था मेरा मकसद पढ़ाना था!!



हजारों कोशिशे की बात मैनें टालने की पर!

कहाँ टलती? रकीबों को तो मेरा घर जलाना था!!



मेरा भी था कली सा एक नन्हा,फूल सा बेटा!

वही मेरा सहारा था वही मेरा खजाना था!!



उतर आये लिये हथियार घर में जब अधर्मी वें!

कि तब जाके… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on December 29, 2014 at 10:00am — 39 Comments

गजल- बिना तेरे किसकी इबादत करेंगे!

१२२ १२२ १२२ १२२

बहुत दुख दिये है कि नफरत करेंगे!
तेरी अब कभी हम न चाहत करेंगे!!

जरा सोच इतना लिया होता जालिम!
बिना तेरे किसकी इबादत करेंगे!!

समझ ही न पाये मुहब्बत मेरी तुम!
कि मर के भी तुमसे मुहब्बत करेंगे!!

वे बच्चें हैं उन पर न गुस्सा करो यूं!
वे नादां वही फिर शरारत करेंगे!!

तु जिसके लिए इतना पागल है 'राहुल'!
अदा प्यार की वो न कीमत करेंगे!!

मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on December 28, 2014 at 2:10pm — 22 Comments

गजल-ये नहीं शायरी के पन्नें है!

2122 1222 22

ये मेरी जिन्दगी के पन्ने हैं!
ये नहीं शायरी के पन्ने हैं!!

ये नशेमन है मेरी आहों के!
ये तेरी बेरुखी के पन्ने हैं!!

मुफलिसी बेबसी की ये चींखे!
तीरगी इस गली के पन्नें हैं!!
ंंंंंं
ये तो बच्चों की लाशे है या रब!
ये तेरी खामुशी के पन्ने हैं!!

ना समझ हो अभी क्या समझोगे!
मेरे कागज सभी के पन्ने हैं!!

देखनी हो जिसे दुनिया 'राहुल'!
मुझको पढ़ ले इसी के पन्ने हैं!!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Rahul Dangi Panchal on December 20, 2014 at 7:30pm — 25 Comments

गजल- वो लफ़्ज लफ़्ज गद्दार रखनी है

2212 122 1222

हर शेर में ये दरकार रखनी है!
वो बेवफा तो हर बार रखनी है!!

अशआर शेर अशआर रखनी है!
वो लफ़्ज लफ़्ज गद्दार रखनी है!!

जब तक वो खुदखुशी कर न ले मुझको!
हर लफ़्ज एक तलवार रखनी है!!

बीमार हूँ तो हँस कर दिखाऊं क्यूं!
ये नज़्म भी तो बीमार रखनी है!!

तू मर अभी नहीं सकता ऐ'राहुल'!
के बात और दो चार रखनी है!!


मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on December 11, 2014 at 10:00pm — 14 Comments

वक्त और मुझमे लडाई है

२१२२ २१२२ २१२२ २



बादे मुद्दत फिर मुझे वो याद आयी है!

फिर किसी ने फूल से तितली उडाई है!!



फिर चुभा है दिल में मेरे याद का कंकड!

फिर से उसने आतमा मेरी दुखाई है!!



इसमें उसकी कुछ ख़ता ना है जमाने सुन!

दरअसल इस वक्त और मुझमें लडाई है!!



राख बनकर उड गये दिल जाँ जिगर अरमाँ!

इस तरह उसने मेरी चिट्ठी जलाई है!!



देख ली सारी ये दुनिया और खुदा को भी!

इस जहाँ में सिर्फ़ अपना अपनी माँई है!!



फेंक डाला दिल मेरा उसने गुमां है… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on December 5, 2014 at 12:30pm — 11 Comments

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