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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – November 2015 Archive (5)

ज़िन्दगी के मायने(लघुकथा)

"सारा जीवन बैल की तरह कमाया।अपनी और अपने बच्चों की तरफ न देखा,न ही कोई भविष्य की योजना कर पाए।",झिड़कते हुए उसकी पत्नी ने बोला।

और वह उसकी तरफ एक बार देख ही पाया उत्तर में।

"ऐसे क्या घूर रहे हो मुझे ?कुछ गलत नहीं बोली हूँ।"

"हूँsss।मैंने तो....."

"क्या मैंने तो?कोई सगे भाइयों के लिए कुछ नहीं करता और तुमने तो अब तक का अपना जीवन सौतेलों के लिए जिया।उनको तो बना दिया और ख़ुद.....।"

"क्या बोले जा रही हो भाग्यवान....?"

"आज तो कोई सगा किसी का नहीं,तो सौतेला क्या होगा?अपनी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2015 at 2:24pm — 8 Comments

मुझे जीने दो(लघुकथा)

टेलीविज़न बड़े घमण्ड में ताव दे रहा था,"आज तो ज़माने पर हमारा कब्ज़ा है।हमारे बिना किसी का गुज़ारा नहीं।बच्चे बूढ़े या जवान,सब में अपनी पहचान"

अब रेडियो इतराई,"देर रात तक पढ़ने वालों ,दूर-दराज़ तक के लोगों और मजदूरी करने वालों का मैं करती हूँ मनोरंजन और बांटती हूँ ज्ञान,बहुत दूर तक मेरी भी पहचान।"

अब कंप्यूटर की बारी आई,उसने भी सब की खिल्ली उड़ाई,"क्या रेडियो -टीवी मुझमें सब चलता सब दिखता है।और मनोरंजन से लेकर ज्ञान तक सब मुझमें टिकता है।"

इनकी बातें सुनकर साहित्य… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2015 at 7:09am — 4 Comments

माँ के लिए (लघुकथा)

छाती में भयंकर दर्द के कारण डॉ के पास गया।डॉ ने हृदय रोग होने की आशंका से उससे जुड़े सभी टेस्ट लिख दिए।टेस्ट हुए।रिपोर्ट आई।रिपोर्ट में शक के दायरे की सभी समस्याएं नदारद।रिपोर्ट के अनुसार कोई समस्या नहीं।सुनकर ख़ुशी हुई।फ़िर भी

-डॉ साहब ये छाती में दर्द क्यों हुआ?

-अरे कुछ नहीं!बस गैस,बाई-बादी....।

-पर क्यों?

-कुछ तीखा मसालेदार खा लिया होगा या फिर कुछ खाया ही नहीं होगा।

-हाँ हाँ।नवरात्र के व्रत रखे थे ।

-तुमने!!!!!

-जी।

उसे ध्यान आया बहुत कमजोरी के कारण… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 27, 2015 at 12:19pm — 2 Comments

मिटता मन का मैल(लघुकथा)

अपना पेट काटकर छौटे भाई को पढ़ाया।अपनी जवानी का अधिकत्तर हिस्सा मजूरी करके गुज़ारा।मेहनत करने में दिन न देखा न कभी रात।भाई होनहार जो था पढ़ाई में भी पूरा तेज और लोकव्यवहार में बिलकुल सधा हुआ।

पता नहीं क्या हुनर बख्शा था ऊपरवाले ने उसे।लोगों को झट से मना लेता था और उनके मन तक को पढ़ जाता था।

जब उसके कुछ करने का समय आया तो ,"मुझे नहीं रहना आपके साथ और न ही मैं आपके लिए कुछ कर पाऊँगा।मुझे मेरी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीनी है।मैं जा रहा हूँ।मुझे ढूँढने की भी कभी कौशिश मत करना।" बस इतना… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 19, 2015 at 8:06pm — 11 Comments

आज़ाद देश के ग़ुलाम(लघुकथा)

मोहन कुमार आज एक शराबखाने के एक अलग-थलग कोने में बैठा था।मेज पर सामने एक बोतल शराब के साथ।जिस शराब को वह पीने की ज़बरदस्ती कोशिश कर रहा था,उसे शायद ही कभी पीया हो।एक हल्का सा ज़ाम बमुश्किल गले से उतार पाया।हल्के नशे में उसे अपने ज़िन्दगी का फ्लैशबैक नज़र आने लगा-

कॉलेज से पहले पत्रकारिता के प्रति रूचि..

इंटरमीडिएट के दौरान ही जाने माने टीवी पत्रकार को अपना आदर्श मान लेना...

अपनी रूचि के अनुरूप पत्रकारिता के उच्च कोर्स में प्रवेश लेना....

अपने आदर्श पत्रकार से…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2015 at 7:30pm — 4 Comments

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