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Sulabh Agnihotri's Blog – September 2014 Archive (6)

कौन दे उल्लास मन को ? .. सुलभ अग्निहोत्री

कौन दे उल्लास मन को ? फिर वसन स्वर्णिम, किरन को ?

हो गये जो स्वप्न ओझल फिर दरस उनके नयन को ?

कोपलों पर पहरुये अंगार धधके धर रहे हैं

साधना कापालिकी उन्माद के स्वर कर रहे हैं

त्राहि मांगें अश्रु किससे, वेदना किसको दिखायें

कौन दे स्पर्श शीतल अग्निवाही इस पवन को ?

कोटि दुःशासन निरंतर देह मथते, मान हरते

द्रौपदी का आर्त क्रंदन अनसुना श्रीकृष्ण करते

नेह के पीयूष से अभिषेक कर फिर कौन दे अब

भाल को सौभाग्य कुमकुम, आलता चंचल चरन को…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 28, 2014 at 5:20pm — 16 Comments

है अपनी नस्ल पे भी फख्र अपने गम की तरह से .. - सुलभ अग्निहोत्री

है अपनी नस्ल पे भी फख्र अपने गम की तरह से

दिलों में घर किये हुए किसी वहम की तरह से

बहारें छोड़ती गईं निशान कदमों के मगर

उजाड़ मंदिरों के भव्य गोपुरम की तरह से

खरा है नाम पर नसीब इसका खोटा है बड़ा

ये मेरा देश बन के रह गया हरम की तरह से

बचे हैं गाँठ-गाँठ सिर्फ गाँठ भर ही रिश्ते सब

निभाये जा रहे हैं बस किसी कसम की तरह से

सजा गुनाह की उसे अगर दें, कैसे दें बता ?

हमारी रूह में बसा है वो धरम की तरह…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 21, 2014 at 4:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल .......... सुलभ अग्निहोत्री

हद से अपनी गुजर गया कोई ।

चुपके दिल में उतर गया कोई ।।

आँख में आसमान लाया था

मेरी अंजुरी में भर गया कोई ।।

छोटी बच्ची सा झूल बाहों में

मन की हर पीर हर गया कोई

टूटी छत से उतर के कमरे में

चाँदनी सा पसर गया कोई ।।

डाल पे फूल खिल गया जैसे

स्वप्न जैसे सँवर गया कोई ।।

रोशनी को सहेजने में ही

कतरा-कतरा बिखर गया कोई ।।

सामने वालमीकि के फिर से

क्रौंच पर वार कर गया कोई

बह…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 17, 2014 at 3:07pm — 23 Comments

ग़ज़ल - - - सुलभ अग्निहोत्री

कुछ ऐसे सिलसिले हैं जो हमेशा साथ चलते हैं

कुछ ऐसे फासले हैं जोकि यादों में ठहरते हैं

छुपे कुछ राज होते हैं हरेक पैगाम में उसके

कभी हम जान लेते हैं, कभी अनजान रहते हैं

सँदेशे दिल के आते हैं, हमेशा आँख के रस्ते

कभी गालों को तर करते, कभी नूपुर से बजते हैं

वो मेरे साथ ज्यादा रासता तय कर नहीं पाये

पर उतनी राह पर अब भी हजारों फूल खिलते हैं

उन्हें जब याद करते हैं तो कोई गीत होता है

ग़ज़ल होती है जब कोई, उन्हें हम याद…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 16, 2014 at 3:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सर दाँव पे लगा के अब खेल खेल देखें ।
अपना नसीब देखें, उनकी गुलेल देखें ।

शायद उठे भड़क ही कोई दबी चिंगारी
चल राख हौसलों की परतें उधेल देखें ।

चेहरे सफ़ेद सबको कमज़ोर कर रहे हैं
इन बूढ़े नायकों को पीछे धकेल देखें ।

उद्दंड अश्व खाईं की ओर जा रहे हैं
हाथों में अपने लेकर इनकी नकेल देखें ।।

क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Sulabh Agnihotri on September 7, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

गीत

पीर पंचांग में सिर खपाते रहे ।

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे ।

हम सितारों की चैखट पे धरना दिये

स्वप्न की राजधानी सजाते रहे ।

लाख प्रतिबंध पहरे बिठाये गये

शब्द अनुभूतियों के सखा ही रहे

आँसुओं को जरूरत रही इसलिये

दर्द के कांधे के अँगरखा ही रहे

श्वास की बाँसुरी बज उठी जब कभी

हम निगाहें उठाते लजाते रहे।।

पर्वतों से मचलती चली आ रही,

गीत गोविन्द मुग्धा नदी गा रही,

पांखुरी-पांखुरी खिल गई रूप की

भोर लहरा रही, चांदनी गा…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 6, 2014 at 5:11pm — 8 Comments

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