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Sushil Sarna's Blog – August 2016 Archive (8)

ये तो ख़्वाब हैं ...

ये तो ख़्वाब हैं ...

शब् के हों

या सहर के हों

सुकूं के हों

या कह्र के हों

ये तो ख़्वाब हैं

ये कभी मरते नहीं

ज़ज़्बातों के दिल हैं ये

ये किसी कफ़स में

कैद नहीं होते

ये नवा हैं (नवा=स्वर)

ये हवा हैं

ये ज़ुल्मों की आतिश से

तबाह नहीं होते

ये हर्फ़ हैं

ये नूर हैं

किसी सनाँ के वार से (सनाँ=भाला)

इन्हें अज़ल नहीं आती

पलकों की ज़िंदाँ में (ज़िंदाँ =कारागार)

ये सांस लेते हैं

ज़िस्म फ़ना होते हैं मगर…

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Added by Sushil Sarna on August 20, 2016 at 9:02pm — 8 Comments

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

1 .

एक पत्थर उठा

शैतां के लिए

एक पत्थर उठा

जहां के लिए

एक पत्थर उठा

मकां के लिए

देवता बन

जी उठा

एक पत्थर

इन्सां के लिए

...... ..... ..... .....

२.

मैं आज तक

वो रिक्तता

नहीं नाप सका

जिसमें

कोई माँ

अपने जन्मे को

तन्हा छोड़

ब्रह्मलीन हो जाती है

मन को शून्यता की

क़बा दे जाती है

..... ..... ..... ..... .....

३.

हमने

प्रवाहित कर दी थी…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 16, 2016 at 2:19pm — 10 Comments

आजादी के पावन पर्व पर....

आजादी के पावन पर्व पर.....

आजादी के पावन पर्व पर

तिरंगा हम फहराते हैं

मर मिटने को देश…

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Added by Sushil Sarna on August 15, 2016 at 11:31am — 8 Comments

भ्रम.....

भ्रम ....

कितनी देर तक

तुम अपने जाने से पहले

मुझे ढाढस बंधाते रहे

मेरी अनुनय विनय को

अपनी मजबूरियों के बोझ से

बार बार दबाते रहे

तुम्हारे दो टूक शब्दों का

मुझपर क्या असर होगा

तुमने एक बार भी न सोचा

बस कह दिया

मुझे जाना होगा

कब आना हो

कह नहीं सकता

मैं अबोध अंजान

क्या करती

सिर हिला दिया

नज़रें  झुका ली

अपनी व्यथा

पलकों में छुपा ली

तुम्हारे कठोर शब्दों का…

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Added by Sushil Sarna on August 14, 2016 at 4:30pm — 2 Comments

बहुत डरता है ......

बहुत डरता है ......

बहुत डरता है

मनुष्य अपने जीवन के

क्षितिज को देखकर

अपनी आकांक्षाओं के

असीमित आकाश में

जीवन के

सूक्ष्म रूप को देख कर

कल्प को अल्प

बनता देखकर

सच ! बहुत डरता है

मुखौटों को जीने से

थक जाता है 

संवदनाओं के

आडंबर के बोझ ढोने से

हार जाता है 

दुनिया के साथ जीते जीते

डर जाता है

हृदय की गहन कंदराओं में

अपने ही अस्तित्व की

मौन उपस्थिति…

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Added by Sushil Sarna on August 9, 2016 at 5:00pm — 8 Comments

ग़ुल अहसासों के ......

ग़ुल अहसासों के ......

क्यों

कोई

अपना

बेवज़ह

दर्द देता है

ख़्वाबों की क़बा से

सांसें चुरा लेता है

ज़िस्म

अजनबी हो जाता है

रूह बेबस हो जाती है

इक तड़प साथ होती है

इक आवाज़

साथ सोती है

कुछ लम्स

रक्स करते हैं

कुछ अक्स

बनते बिगड़ते हैं

शीशे के गुलदानों में

कागज़ी फूलों से रिश्ते

बिना किसी

अहसास की महक के

सालों साल चलते हैं

फिर क्यों

इंसानी अहसासों के रिश्ते

ज़िंदा होते हुए…

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Added by Sushil Sarna on August 6, 2016 at 4:19pm — 6 Comments

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा लगता है

फर्श पर

चाबी के चलते खिलौने देखकर

एक ही गति

एक ही भाव

न किसी से कोई गिला

न शिकवा

ऐ ख़ुदा

कितना अच्छा होता

ग़र तूने मुझे भी

शून्य अहसासों का

खिलौना बनाया होता

अपना ही ग़म होता

अपनी ही ख़ुशी होती

न लबों से मुस्कराहट जाती

न आँखों में नमी होती

सब अपने होते

हकीकत की ज़मीं न होती

ख़्वाबों का जहां न होता

बस ऐ ख़ुदा

तूने हमें भी वो चाबी अता की होती…

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Added by Sushil Sarna on August 2, 2016 at 7:30pm — 24 Comments

इक माँ होती है ....

इक माँ होती है ....

कितना ऊंचा

घोंसला बनाती है

नयी ज़िन्दगी का

ज़मीं से दूर

घर बनाती है

अपने पंखों से

अपने बच्चों को

हर मौसम के

कहर से बचाती है

न जाने कहाँ कहाँ से लाकर

अपने बच्चों को

दाना खिलाती है

पंख आते हैं

तो उड़ना सिखाती है

नए पंखों को

आसमां अच्छा लगता है

ज़मी से रिश्ता बस

सोने का लगता है

देर होते ही मां

घोंसले पे आती है

नहीं दिखते बच्चे

तो बैचैन हो जाती है

सांझ होते…

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Added by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 2:27pm — 14 Comments

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