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अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's Blog – June 2022 Archive (2)

ग़ज़ल (जबसे तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया)

22 22 22 22 22 2

जबसे तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया

यूँ लगता है जैसे नाता तोड़ दिया

मंदिर-मस्जिद के चक्कर में कितनों ने 

पुश्तैनी रिश्तों को यूँ ही तोड़ दिया 

मुझ पर है इल्ज़ाम कि मैं चुप रहता हूँ 

तुम ने भी तो लड़ना-वड़ना छोड़ दिया  

मुझको आगे आते जो देखा उसने 

ग़ुप-चुप अपनी राहों का रुख़ मोड़ दिया

मुझको बीच समंदर उसने जाने क्यों 

लहरों की बाहों में तन्हा छोड़…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 30, 2022 at 10:44pm — 8 Comments

ग़ज़ल (... तमाशा बना दिया)

221 - 2121 - 1221 - 212

मौज आयी..घर को फूंक तमाशा बना दिया

हा.... झोंपड़ा फ़क़ीर ने ख़ुद ही जला दिया 

कर के इशारा बज़्म से जिसको उठा दिया

दरवेश ने उसी का मुक़द्दर बना दिया

अपनों के होते ग़ैर भला क्यूँ उठाए ग़म 

नादान दोस्तों ने ही रुसवा करा दिया

नफ़रत की फ़स्ल देख के ख़ुश हो रहे थे सब

बोया था जिसने ज़ह्र उसी को चखा दिया 

मुझको था ए'तिमाद कि आ जाएगी बहार

रंग-ए-ख़िज़ाँ ने मेरे यक़ीं को…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 20, 2022 at 11:59am — 12 Comments

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