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JAWAHAR LAL SINGH's Blog – June 2013 Archive (4)

बरसात से बर्बादी/ चौपाई एवं दोहों में/ जवाहर

प्रस्तुत रचना केदारनाथ के जलप्रलय को अधार मानकर लिखी गयी है.

चौपाई - सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.

भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.

पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.

बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!

रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई

अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा

पंथ बीच जो कोई आवे. जल धारा सह वो बह जावे.

छिटके पर्वत रेतहि माही,…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 23, 2013 at 6:00pm — 28 Comments

राम सिया की भक्ति/ चौपाई एवं दोहों में (जवाहर)

रामसिया का रूप

राम सिया की जोड़ी कैसी, काम रती की जोड़ी जैसी.

राम सिया को जो नर ध्यावे, सब सुख आनंद वो पा जावे.

राम सिया जग के सुख दाता, जो मांगे वर वो पा जाता.

शुबह शाम नर नाम सुमीर तू, अपना काम समय पर कर तू.

कष्ट न दूजे को दे देना, सम्भव हो तो दुःख हर लेना.

परमारथ सा धरम न दूजा, नहीं जरूरत कोई पूजा.

वेद्ब्यास मुनि सब समझावे, गाथा बहु विधि कहहि सुनावे.

अन्तकाल में कष्ट जो पावे, सकल अतीत समझ में आवे.

कहत जवाहर हे रघुराई, मूरख मन से करौं बराई.

मरा मरा…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:30am — 12 Comments

रवि महिमा चौपाई एवं दोहों में / जवाहर

रवि महिमा

रवि की महिमा सब जग जानी, बिनू रवि संकट अधिक बखानी.

शुबह सवेरे प्रगट गगन में, फूर्ति जगावत जन मन तन में!

दूर अँधेरा भागा फिरता, सूरज नहीं किसी से डरता.

आभा इनका सब पर भारी, रोग जनित कीटन को मारी

ग्रीष्म कठिन अति जन अकुलानी, शरद ऋतू में दुर्लभ जानी

ग्रीष्महि जन सब घर छुप जावें, शरद ऋतू में बाहर आवें.

गर्मी अधिक पसीना आवे, मेघ दरस न गगन में पावे.

पावस मासहि छिप छिप जावें. बादल बीच नजर नहीं आवे.

हल्की बारिश में दिख जावें, इन्द्रधनुष अति सुन्दर…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:26am — 8 Comments

पहली बरसात में! (दोहे -जवाहर)

पुष्प वाटिका बीच मुदित, बाला मन को मोह 

सुमन पंखुरी सुघर मृदुल , श्यामा तन यूँ सोह!

पनघट पर सखिया सभी, करत किलोल ठठाहि ,

छलकत जल से गागरी, यौवन छलकत ताहि!

पुष्प बीच गूंजत अली, झन्न वीणा के तार .

तितली बलखाती चली, कली ज्यों करे श्रृंगार!

पीपल की पत्तियां भली, मधुर समीरण साथ,

देखत लोगन सुघर छवी, हिय हिलोर ले साथ.

पवन चले जब पुरवाई, ले बदरा को साथ 

मन विचलित गोरी भई, आंचल ढंके न माथ…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 4, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

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