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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – March 2021 Archive (6)

होली में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



कोई गर रंग डाले  तो  न खाना खार होली में

भिगाना भीगना जी भर बढ़ाना प्यार होली में।१।

*

मिलन का प्रीत का सौहार्द्र का त्योहार है ये तो

न हो ताजा  पुरानी  एक  भी  तकरार होली में।२।

*

मँजीरे ढोल की  थापें  पड़ा करती हैं फीकी सच

करे पायल जो सजनी की मधुर झन्कार होली में।३।

*

जमाना भाँग ठंडायी पिलाये पर सनम तुम तो

दिखाकर मदभरी आँखें करो सरशार होली में।४।

*

चले हैं  मारने  हम  तो  दिलों  से  दुश्मनी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 28, 2021 at 2:00pm — 8 Comments

कभी दुख में भी मुस्कराकर तो देखो -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२२

कभी रिश्ते मन से निभाकर तो देखो

जो  रूठे  हुए  हैं  मनाकर  तो  देखो।१।

*

खुशी  दौड़कर  आप  आयेगी साथी

कभी दुख में भी मुस्कराकर तो देखो।२।

*

बदल लेगा रंगत जमाना भी अपनी

कभी झूठी हाँ हाँ मिलाकर तो देखो।३।

*

कभी  रंज  दुश्मन  नहीं  दे  सकेगा

स्वयं से स्वयं  को बचाकर तो देखो।४।

*

सदा  पुष्प  से  खिल  उठेंगे  ये रिश्ते

कि पाषाण मन को गलाकर तो देखो।५।

*

कोई…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 20, 2021 at 6:15pm — 7 Comments

पूरा किया है कौन वचन आपने जनाब -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



चाहे कमाया खूब  हो धन आपने जनाब

लेेेकिन ज़मीर करके दमन आपने जनाब।१।

*

तारीफ  पायी  नित्य  हो  दरवार  में भले

मुजरा बना दिया है सुखन आपने जनाब।२।

*

ये  सिर्फ  सैरगाह  रहा  हम  को  है पता

माना नहीं वतन को वतन आपने जनाब।३।

*

उँगली उठायी नित्य  ही  औरों के काम पर

देखा न किन्त खुद का पतन आपने जनाब।४।

*

देखो लगे हैं  लोग  ये  घर  अपना फूँकने

ऐसी लगायी मन में अगन आपने जनाब।५।

*…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2021 at 8:30am — 9 Comments

तात के हिस्से में कोना आ गया - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२



तात के  हिस्से  में  कोना आ गया

चाँद को भी सुन के रोना आ गया।१।

*

नींद  सुनते  हैं  उसी  की  उड़ गयी

भाग्य में जिसके भी सोना आ गया।२।

*

खेत लेकर इक इमारत कर खड़ी

कह रहा वो  बीज  बोना आ गया।३।

*

डालकर  थोड़ा   रसायन ही  सही

उसको आँखें तो भिगोना  आ गया।४।

*

पा गये जगभर की खुशियाँ लोग वो

एक दिल जिनको भी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2021 at 5:00pm — 12 Comments

पत्थर ने दी हैं रोज नजाकत को गालियाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/ २१२१/१२२१/२१२



पत्थर ने दी हैं रोज नजाकत को गालियाँ

जैसे नशेड़ी  देता  है  औरत  को गालियाँ।१।

*

भाती हैं सब को आज ये चतुराइयाँ बहुत

यूँ ही न मिल रही हैं शराफ़त को गालियाँ।२।

*

ये दौर नफरतों को फला इसलिए जनाब

देते हैं सारे  लोग  मुहब्बत  को गालियाँ।३।

*

दूल्हे को बेच सोचते खुशियाँ खरीद लीं

देता न कोई ऐसी तिजारत…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 9, 2021 at 5:30am — 8 Comments

वोट देकर मालिकाना हक गँवाया- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



दीप की लौ से निकलती रौशनी भी देख ली 

और उस की छाँव  बैठी  तीरगी भी देख ली।१।

*

वोट देकर मालिकाना हक गँवाया हमने यूँ

चार दिन में  सेवकाई  आपकी भी देख ली।२।

*

दुश्मनी का रंग हम ने जन्म से देखा ही था

आज संकट के समय में दोस्ती भी देख ली।३।

*

आ न पाये होश में क्यों आमजन से दोस्तो

दे के उस ने तो  हमें  संजीवनी भी देख ली।४।

*

खूब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2021 at 2:09pm — 20 Comments

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