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Aazi Tamaam's Blog – March 2021 Archive (7)

ग़ज़ल: कोई समझाए माजरा क्या है

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कोई समझाए माजरा क्या है

तीरगी क्या है यूँ कि रा क्या है

मिटना हर शय का तो मुअय्यन है

ज़िंदगानी में निर्झरा क्या है

इक समंदर के जैसे लगती हैं

नम सी आँखों में दिल भरा क्या है

टूट कर ख़्वाब गिरते रहते हैं

आँख में आईना सरा क्या है

देख कर उनको आरज़ू करना

दिल की हसरत का दिलबरा क्या है

इश्क़ में रूह गर जो महके, तो

मुश्क़ फ़िर क्या है मोगरा क्या…

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Added by Aazi Tamaam on March 22, 2021 at 5:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: इश्क़ समझे न कोई दीवाना

2122 1212 22

देख कर मुस्कुराना शर्माना

इश्क़ समझे न कोई दीवाना

है कयामत हर इक अदा इनकी

जुल्फ़ें बिखराना हो या झटकाना

सिर्फ़ आता है इन हसीनों को

दिल चुराना चुरा के ले जाना

क्यों किसी का यूँ दिल जलाते हो

क्यों बनाते हो यूँ ही दीवाना

कितना मुश्किल है चाहतों में सनम

पास रहकर भी दूर हो जाना

बेक़रारी में आहें भरता है

जी न पाता है कोई दीवाना

साल हा साल लम्हा…

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Added by Aazi Tamaam on March 16, 2021 at 9:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल: "दाँव पर आबरू सी रहती है "

2122 1212 22

बे सबब हाव-हू सी रहती है

दाँव पर आबरू सी रहती है

इश्क़ जब भी किसी से होता है

इक अजब जुस्तजू सी रहती है

लम्हा दर लम्हा दिल मचलता है

हर पहर आरज़ू सी रहती है 

यूँ लगे की हर एक चहरे पर

सूरत इक हू-ब-हू सी रहती है

मन भटकता है वन हिरन बनकर

खुशबु इक रू-ब-रू सी रहती है

ख़ुद से ही अब वो बात करता है

दिल में इक गुफ़्तगू सी रहती है

जलके सब ख़ाक हो…

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Added by Aazi Tamaam on March 11, 2021 at 1:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल : "जी ही पाते हैं की न मर पाते"

अरकान- 2122 1212 22

सिर्फ़ इतना हुनर जो पा जाते

काश हम भी किसी के हो पाते

क्यों तुम्हें इतनी जल्दी रहती है

मेरी सुनते कुछ अपनी फ़रमाते

हर किसी से अदब से मिलते हो

अच्छा होता जो थोड़ा इतराते

चारा गर ही हमारा रूठा है

हम किसे ज़ख़्म अपने दिखलाते

फ़िर कहाँ कोई दिल में यूँ चुभता

गर जो रिश्ता सभी से तोड़ आते

चाहतों में भी यूँ तो दीवाने

जी ही पाते हैं की न मर…

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Added by Aazi Tamaam on March 7, 2021 at 1:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: "सनम हमको मिला"

2211  2122  1221  1222  12

चाहत में सिवा ही चाहत के क्या क्या न सनम हमको मिला

हर जख्म मिला है दिल को यूँ मरहम न सनम हमको मिला

किस को है पता यहाँ कौन कब हो जाये यूँ ही बे-वफ़ा

हम जान लुटा आये अपनी फिर भी न सनम हमको मिला

ता उम्र लगा रहा इश्क में भी यूँ तो मिलना बिछड़ना

मिलके न जुदा हो पर कोई ऐसा न सनम हमको मिला

थोड़ा तो क़रार आये या रब इस दिल ए बेजार को

थोड़ा भी सुकूँ गो चाहत में आखिर न सनम हमको…

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Added by Aazi Tamaam on March 5, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल: "ठहर सी जाती है"

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जब तन्हाई में यादों की बरसात ठहर सी जाती है

इक हूक सी उठती है दिल में ह'यात ठहर सी जाती है



चुपके चुपके आँखों ही आँखों में इश्क़ जवाँ होता है

गर जुम्बिश ना हो आँखों में शुरुआत ठहर सी जाती है



हर पल मिलने की चाहत में पल पल बेताबी रहती है

दिन ढलते ढलते ढल जाता है रात ठहर सी जाती है



होठों पर बात न आ जाये दिल बेचैनी में रहता है

होठों पर आते ही दिल की हर बात ठहर सी जाती है



रह रह कर आहें…

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Added by Aazi Tamaam on March 2, 2021 at 9:30pm — No Comments

"कोई क्यों रहे "

1212 222 212

चढ़ान   में   भी    कोई   क्यों   रहे

ढलान में भी कोई क्यों रहे

सियासती   हो   रंग  ए  आसमाँ

उड़ान में भी कोई क्यों रहे

दुकान-ए-दिल ही जब हो लुट चुकी

अमान…

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Added by Aazi Tamaam on March 1, 2021 at 10:30am — No Comments

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