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Rahila's Blog – March 2016 Archive (4)

जोंक (लघुकथा )राहिला

"हजूर,मांई बाप! कुछ रूपया मिल जाता तो बड़ी मेहरबानी हो जाती।"

"कितने चाहिये?"आवाज में दबंगी की खनक थी ।

"यात्रा लाक(लायक)हजूर!बस दो हजार।"

"अच्छा...चैत काटने जा रहे हो।"

"हओ मालिक! "

"हूँsss..कोई गारंटी या कुछ गिरवी रखने लाये हो?"जोंक को जैसे शिकार मिला ।

"काहे मजाक करते हो सरकार!हम गरीबों के पास क्या धरा?"

"देखो भई!मैं लेनदेन का काम कच्चा करता ही नहीं ।बिना कुछ गिरवी रखे एक दमड़ी नहीं दूंगा।"शब्दों को चबाते हुये वे कुछ रूके,फिर पुनः बोले-वैसे...,एक चींज है… Continue

Added by Rahila on March 20, 2016 at 11:10pm — 18 Comments

कहर (लघुकथा) राहिला

पकी फसल पर असमय बरसात और ओलों के कहर ने किसानों के पेट और कमर पर जो लात मारी थी। उसी का सर्वे चल रहा था। कौन किस हद तक घायल है उसी हिसाब से मुआवजा मिलना था। सो,दो सरकारी मुलाजिम एक पुरवा से दूसरे पुरवा जा जाकर कागज़ रंग रहे थे।

"भाग यहाँ से साsssले, यहाँ आया तो तेरी खैर नहीं। हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? तेरा मन नहीं भरा मेरे बाल बच्चे खा कर? और कितनों को खायेगा?आ..ले,खाले...सब को खाजा..आजा,आ के दिखा तुझे अभी मजा चखाता हूं"कह कर वो अंधाधुंध पत्थर मारने लगा। उसकी विक्षिप्त सी हालत देख…

Continue

Added by Rahila on March 15, 2016 at 1:30pm — 31 Comments

गोली (लघुकथा)राहिला

उसके अब्बा को खानदान में ही बेटी ब्याहनें की जाने कैसी सनक सवार हुई,कि अपने भतीजे से शादी के फरमान की गोली मेरे सीने में दागकर, मेरी और शब्बो की मुहब्बत का जनाज़ा निकाल दिया ।इसके बाद मैंने शहर ही छोड़ दिया और पूरे तीन साल बाद आज जब बस अड्डे पर उतरा तो उसे पूरे साजो सामान और एक छोटे से बच्चे के साथ सामने खड़ा पाकर यूं लगा जैसे किसी ने फिर दिल पर गोली दाग दी हो।मैं लड़खड़ा सा गया और जाने कब, कैसे उसके पास पहुँच गया पता नहीं ।शायद वो मेरी कैफियत समझ गई थी । तभी उसका शौहर रिक्शा लेकर आ पहुंचा ।… Continue

Added by Rahila on March 8, 2016 at 12:22pm — 22 Comments

खट्टी डकारें(लघुकथा )राहिला

13-14 साल के कबाड़ी को कबाड़ तुलवा रहे सेठजी!लम्बी-लम्बी डकारों से परेशान हो रहे थे । जब कुछ ना सूझा तो पास ही खड़ी सेठानी पर झुंझला पड़े । "लगता है आजकल तरकारी में खुले हाथ से तेल मसाला उड़ेल रही हो!मार डाला इन खट्टी डकारों ने "

"अरे कैसी बात करते हैं सेठजी! तेल मसाले खाने से थोड़े ना खट्टी डकारें आती हैं!हम तो रोज ढ़ाबे पर ग्राहकों की बची तेल मसाले वाली तरकारी खाते हैं जुगाड़ से ।

चेहरे से चंचल बातूना लड़का!चहक के बोला ।

"अच्छा..!तो तू बहुत बड़ा जानकार है।तुझे बहुत पता है।"वह… Continue

Added by Rahila on March 5, 2016 at 12:41pm — 10 Comments

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