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Shikha kaushik's Blog – January 2011 Archive (4)

लघु कथा: फूल

सिमरन दो साल के बेटे विभु को लेकर जब से मायके आई थी उसका मन उचाट था, गगन से जरा सी बात पर बहस ने ही उसे यंहा आने के लिए विवश किया था | यूँ गगन और उसकी 'वैवाहिक रेल' पटरी पर ठीक गति से चल रही थी पर सिमरन के नौकरी की जिद करने पर गगन ने इस रेल में इतनी जोर क़ा ब्रेक लगाया क़ि यह पटरी पर से उतर गई और सिमरन विभु को लेकर मायके आ गयी | सिमरन अपने घर से निकली तो देखा विभु उस फूल की  तरह मुरझा गया था जिसे बगिया से तोड़कर बिना…

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Added by shikha kaushik on January 23, 2011 at 9:00am — 2 Comments

जीवन कर्म

हर  सुबह नई आशा  के साथ जागो;

 दिल में विश्वास रखो ऊपर वाले के प्रति;

गिरो अगर तो गिरकर संभालो खुद को;

जिन्दगी में जीत फिर तुम्हारी होगी!

ये मत सोचो क्या खो दिया;…

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Added by shikha kaushik on January 22, 2011 at 9:30am — 2 Comments

कविता -आत्मशक्ति पर विश्वास

जीवन एक ऐसी पहेली है जिसके बारे में बात करना वे लोग ज्यादा पसंद करते हैं जिन्होंने कदम-कदम पर सफलता पाई हो.उनके पास बताने लायक काफी कुछ होता है. सामान्य व्यक्ति को तो असफलता का ही सामना करना पड़ता है.हम जैसे साधारण मनुष्यों की अनेक आकांक्षाय होती हैं. हम चाहते हैं क़ि गगन छू लें; पर हमारा भाग्य इसकी इजाजत नहीं देता.हम चाहकर भी अपने हर सपने को पूरा नहीं कर पाते .यदि मन की हर अभिलाषा पूरी हो जाया करती तो अभिलाषा भी साधारण हो जाती .हम चाहते है क़ि हमें कभी शोक ;दुःख ; भय का सामना न करना पड़े.हमारी… Continue

Added by shikha kaushik on January 19, 2011 at 10:00pm — 6 Comments

क्रांति स्वर मे ललकारें ...

छोड़ विवशता-वचनों को

व्यवस्था धार बदल डालें

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें .

*************************************

छीनकर जो तेरा हिस्सा

बाँट देते है ''अपनों'' में ;

लूटकर सुख तेरा सारा लगाते

''सेंध'' सपनों में ;

तोड़ कर मौन अब अपना

उन्हें जी भरके धिक्कारें

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें .

*************************************

हमीं से मांग कर वोटें

वो सत्तासीन हो जाते;

भूल करके सारे… Continue

Added by shikha kaushik on January 12, 2011 at 11:00am — 1 Comment

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