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Ram shiromani pathak's Blog – January 2013 Archive (13)

"एक प्रयास"

एक प्रयास-;

सभी गुरुजनों व् मित्रों का सहयोग और अमूल्य सुझाव चाहूँगा!!

जान दे देते है प्यार में ,

ऐसे भी लोग है इस संसार में !

इतनी अथाह श्रद्धा कैसे ,

"दीपक" क्या वे बीमार थे प्यार में!!

इश्क का छूरा लेकर टहलती है ,

जहाँ मिले वहीँ हलाल देती है !

बड़ी पारखी नज़र है इनकी,

मोहब्बत के मारों को पहचान लेती है!

मनाने चले थे इद,

हो गयी बकरीद !

प्यार किया था जुर्म नहीं,

"दीपक" ऐसी ना थी उम्मीद!

निस्वार्थ प्रेम से जो जाता ,

सारी…

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Added by ram shiromani pathak on January 31, 2013 at 9:36pm — 3 Comments

"धमाके के बाद "

क्यूँ छलक रहा अश्रु मेरा ,
क्यूँ जा रहा सुख मेरा !
करुणा बढ रही ह्रदय में ,
हाहाकार है स्वरों में !!

क्या ज़िन्दगी यहाँ सस्ती है ,
यह शमशान या बस्ती है !
जहाँ करते आमोद -प्रमोद सानन्द,
अब वीरान पड़ा है भू-खंड !

क्यूँ हो रहे तुम अधीर ,
प्रश्न करते ये मृत शरीर!
दिल से बस आह !निकलती,
जिनकी पूर्ति नम ऑंखें करती!

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 29, 2013 at 7:19pm — 7 Comments

"पैसे की दुनियां "

वाह रे पैसा ,

पैसे का अहंकार !

पैसे से सबकुछ

खरीदने को तैयार !

तो जाओ !!

पैसे से दो बूंद,

आंसू खरीद लाओ!

पैसे से खुशियों की,

एक दुकान तो लगाओ !

पैसे से रोते बच्चे को ,

एक मीठी नींद सुला दो !

वर्षों से खड़े वृक्षों को

थोड़ी सी सैर करा दो!!

पैसे से किसी का

दर्द कम कर दो

पैसे से किसी के दिल में

प्यार और सदभावना भर दो !

पैसे से ओंस की बूंदों में,

रजत आकर्षण डाल दो!

वीरान पड़े…

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Added by ram shiromani pathak on January 28, 2013 at 1:30pm — 3 Comments

"बात दो रोटी की है "

कैसे भूल सकता हूँ ,
भूंख से उसका कराहना !
ज़िन्दगी और मौत का ,
अजीब मंज़र !!

रोटी के लिए संघर्ष ,
सोचो कितनी दर्दनाक मौत ,
वो भी भूंख से ,
पेट की आंत गवाह है !!

अखबार का प्रथम पृष्ठ ,
भुखमरी से मौत का चित्रण ,
छापा गया था उसमे ,
विधिवत देकर उदाहरण!

कितना परिश्रम किया होगा ,
आंकड़े एकत्र करने में ,
काश! थोड़ी मेहनत की होती ,
इनका पेट भरने में !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक \अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 25, 2013 at 8:23pm — 4 Comments

"दर्द और आंसू "

स्वयं के आंसुओं से ,

कपोल उसका झुलस गया !

दया हाय! आयी मुझको ,

मेरा भी अश्रु बह गया !!

अपनो के लिए उसकी ,

पत्थर तोड़ती माता !

भूंख से छटपटाता बच्चा,

हाय! पाषाण ह्रदय विधाता !!

असहनीय पीड़ा से रो रही थी ,

नम आँखों से दर्द धो रही थी !

कई दिनों की भूंखी बेचारी ,

खुली आँखों से सो रही थी !

उसके आँख का खारा पानी ,

यह कह रहा था !

दिल में कहीं गम का ,

समंदर बह रहा था !!

दम तोड़ती ज़िन्दगी ,

दम तोड़ती मानवता !

कहीं ना…

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Added by ram shiromani pathak on January 23, 2013 at 12:38pm — 7 Comments

प्रतिस्पर्धा

भ्रष्टाचार में भी प्रतिस्पर्धा,

करते आपस में दंगल है !

क्या करूँ कितना मिल जाय ,

बस लूट पाट को बेकल है !!

पैसे के लिए लार टपकाते ,

मार पीट को ये तत्पर है !

बोलबचन से कभी कभी तो,

कर देते सब गुड़-गोबर है !!

कायरता ,पशुता से संचित ,

बनाते नया-नया पैमाना !

चालाकी,मक्कारी ही इनका,

बन चुका धंधा पुराना !!

धन के वन में विचरण करते ,

जैसे इनका ही जंगल है !

जंगल राज़ चला रहे फिर भी ,

कहते है कि सब मंगल है !!

राम शिरोमणि पाठक…

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Added by ram shiromani pathak on January 21, 2013 at 8:22pm — 4 Comments

"हुंकार"

शब्दों में एक ज्वाला भर लो ,

लड़ने को अब कमर कस लो !

दुर्दशा पर चटखारे ना ले कोई ,

इतना खुद को सशक्त कर लो !!

शायद डर से गुमराह हो ,

अपना रास्ता खुद ही चुन लो !

इस हाल के ज़िम्मेदार है जो ,

उनसे अब दो दो हाँथ कर लो !!

यदि सहना है उत्पीडन इनका ,

यूँ ही खुद को बदनाम कर लो!

पड़े रहो मुर्दों की तरह,

खुद को इनका गुलाम कर लो!!

लड़ नहीं सकते जब तुम ,

कायर सा फिर जीना क्यूँ !

तिल तिल कर मरने से अच्छा ,

खुद का ही काम तमाम कर लो…

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Added by ram shiromani pathak on January 19, 2013 at 1:49pm — 3 Comments

"सर्द रातों का आतंक "

सर्द रातों का आतंक ,

सबका बुरा हाल हुआ !

रूह कपा देने वाली ठण्ड से ,

खड़ा एक एक बाल हुआ !!

क़यामत की धुंधली रातों में

डरे ,कांपते हुए जो सिमटे है !

उन गरीबों का क्या हाल होगा ,

जो फटे कम्बल में लिपटे है !!

सुख सुविधाओ से परिपूर्ण वो ,

क्या जाने सर्द रातों का स्याह सच !

कैसे ढकता बदन वह ,

एक अधखुला कवच !!

कहर बरसाती ठण्ड रातें ,

बर्फीली हवा झेलते फेफड़े ,

नेता जी कम्बल घोटाला करके ,

कलेजे पे रखते बर्फ के टुकड़े!!

राम…

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Added by ram shiromani pathak on January 18, 2013 at 1:43pm — 4 Comments

"अधखुली दुनियां "

आजकल हास्य के लिए ,

अश्लीलता का सहारा लिया जाता है !

जनता खूब हंसती भी है ,

उन्हें भी आनंद आता है !!

जब प्रतिदिन नवीन आविष्कार हो रहे ,

अश्लीलता और नग्नता पर !

आत्मा कह रही मेरी ,

तू भी कुछ नया कर !!

इस अधखुली दुनियां की ,

बात बहोत ही निराली है !

चमक तो दिखता है ,

पर दिन भी होती काली है !

टिप्पणी करने से डरता हूँ ,

क्या कहूँ ?कैसे कहूँ ?

उलझता जा रहा हूँ ,

इस अधखुली दुनियां में !!

राम शिरोमणि पाठक…

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Added by ram shiromani pathak on January 17, 2013 at 6:07pm — 2 Comments

व्यसन-:

व्यसन बना जी का जंजाल ,

असमय ही खाए जा रहा काल !

इतनी सुन्दर ज़िन्दगी को ,

क्यूँ व्यर्थ में गवांते हो !

जानते हो की बुरी है ,

फिर भी पीते या खाते हो !!

व्यसन के अतिरिक्त कोई ,

कार्य नहीं है शेष !

अल्प दिनों बाद केवल

रह जाओगे अवशेष !!

फटे कपड़ों में जब इनके बच्चे ,

घर से बाहर निकलते है ,

लोग दया दिखाते बच्चों पर ,

व्यसनी को गाली देते है !!

सोचो ऐसे व्यसनी को ,

उनके अपने कैसे सहते है,

नशा करने के बाद ,…

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Added by ram shiromani pathak on January 16, 2013 at 12:30pm — 3 Comments

प्रताड़ना

कोई हद नहीं थी ,

उसके ऐतबार की !

एक अंतहीन अंधविश्वास ,

शायद !अतिशयोक्ति थी प्यार की !!

कोई प्रतिरोध नहीं किया ,

सोचा न क्या होगा अंजाम ,

घुटन भरी ज़िन्दगी ,

जीती रही गुमनाम !!

जब कोई अपना ही ,

दिन रात प्रताड़ित करता है !

एक नहीं सैकड़ों बार ,

जी जी कर फिर वो मरता है !

मानसिक बीमार कर दिया इतना ,

इसलिए उसने आत्मदाह किया ,

घुटन भरी ज़िन्दगी ने ,

ऐसा करने पर मजबूर किया !!

इतना भयंकर निर्णय ,

कोई ऐसे ही…

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Added by ram shiromani pathak on January 15, 2013 at 3:30pm — 7 Comments

प्रकृति सौन्दर्य

कितने सुन्दर लग रहे थे ,
डाल पर हिलते सुमन !
मंत्र मुग्ध हो गया सुन ,
भ्रमरों के मधुर गुंजन !!
प्रकृति की अनुपम सुन्दरता,
कितनी कोमल और अनंत !
कल्पने से परे है ,
निर्माणकर्ता की सोच अनन्त !!
पुष्प आगंतुक को सदैव ,
सस्नेह प्रफुल्लित करता है !
हो कोई कैसी भी ऋतू ,
तत्पर सेवा में रहता है !
वातावरण रहेगा सदैव ,
मुस्कुराता मंद मंद !
बस निकलती…
Continue

Added by ram shiromani pathak on January 13, 2013 at 4:00pm — 3 Comments

आधुनिकता

अजीब विडम्बना देखो ,
शिष्टाचार विलुप्त हो गया !
बेटा! बेटा नहीं रहा ,
बाप हो गया !
लज्जा आती है इन्हे ,
प्रणाम ,.नमस्कार करने में !
थोडा भी संकोच नहीं ,
महिला मित्र से गले मिलने में !!
मै सोच रहा हूँ ,
क्या होगा आनेवाला कल !
मेरे उदार संस्कारों का ,
कैसा है ये फल !!
प्रायः सुनता रहता हूँ ,
हाय ,बाय और हेल्लो ,
कितना स्नेह छुपा है इनमे…
Continue

Added by ram shiromani pathak on January 13, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

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