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Satyendr sengar's Blog

Ghazal

इक अंधेरा टिका  कब से मीनार पर

क्या कहें इस ज़माने के किरदार पर



हाथ का भी निवाला जो छीनेगा वो

स्वप्न सोने के रख देगा  बाज़ार पर



सब है डूबे तिजारत की घुड़दौड़ में

अब नज़र कौन डालेगा  बीमार पर



रहनुमाओं के सुख, भत्ते-वेतन सभी

गाज बन कर गिरेंगे ख़रीददार पर



जुगनुओं  के  सहारे  चली  ज़िंदगी

कोई  चंदा  न उतरा था  दीवार पर



बिकती हैं जो कलम इक पुरस्कार में

वो कसीदे लिखें  आज सरकार  पर



रात भर  अध्र्य  जिसको  चढ़ाते रहे

वो  लुटेरा… Continue

Posted on January 4, 2011 at 2:55pm

ग़ज़ल

जो  ग़ल्तियाँ हुईं थीं  उसी का  सिला है ये
बारूद  घर में रखने का  फल ही मिला है ये
 
दुनियाँ से कह रहे थे  हम  फसाना शाँति का
बस ये नहीं बताया.. कि दिल भी छिला है ये

जब जिसका मन किया है हमसे खेल कर गया
मुझको  कोई बताये  कि   कैसा   किला है ये

अपनों की  साजिशों  से  मात  बारहा  मिली
द्वापर से  चलता आया.. ऐसा सिलसिला है ये

घर फूस का बनाया  उसमें आग भी रख ली
कुर्सी की ख्वाहिशों का  फूल ही  खिला है ये

Posted on January 3, 2011 at 2:54pm

मेरा वतन

मुझको   मेरा  वतन   पुर   अमन   चाहिए

तहज़ीब  अपनी   गंग   ओ  जमन  चाहिए



ये  राम  की  ज़मीन  है  गौतम  की ये ज़मीं

नानक  भी  मिलेगा  यहीं  रहमान  भी  यहीं

सब  आ  सकें  इतना  बड़ा  ज़हन  चाहिए



झगड़े   फ़साद   लूट   न  हो  मेरे देश में

या   रब  ग़रीबी  भूख  न  हो  मेरे देश में

मिल बांट  कर के  खाने  का चलन चाहिए



तुमने  बिछा  रखी  यहाँ  कितनी बड़ी चैiसर

मुहरे  बना  दिये  हमें  इस  तरहा  बाँट कर

टुकड़े   नहीं    समूचा   इक   गगन  चाहिए



क्यूं … Continue

Posted on January 3, 2011 at 2:00pm

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At 8:40am on January 24, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
 
 
 

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