For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Ayub Khan "BismiL"
  • Male
  • Jaipur Rajsthan
  • India
Share on Facebook MySpace

Ayub Khan "BismiL"'s Friends

  • nazir ahmad ansari(Nazir NAZAR)
  • Saarthi Baidyanath
  • arvind ambar

Ayub Khan "BismiL"'s Groups

 

Ayub Khan "BismiL"'s Page

Profile Information

Gender
Male
City State
JAIPUR RAJSTHAN
Native Place
JAIPUR
Profession
BUSSNES
About me
i m bissnesman in Stone Jewleery and also a Urdu Poet

Ayub Khan "BismiL"'s Blog

ग़ज़ल (अय्यूब खान "बिस्मिल")

कर दिया आम मिरे इश्क़ का चर्चा देखो

देखो ज़ालिम कि मुहब्बत का तरीक़ा देखो

याद करना कि मिरे दर्द कि शिद्दत क्या थी

खुद को ज़र्रों में कभी तुम जो बिखरता देखो

खूं तमन्ना का मुसलसल यहाँ बहता है अब

मेरी आँखों में है इक दर्द का दरिया देखो

यूँ सुना है कि वो नादिम है जफ़ा पे अपनी

उसके चेहरे पे जफाओं का पसीना देखो

अपने हाथों से सजाके में करूँगा रुखसत

कर लिया है मेने पत्थर का कलेजा देखो

ये हिना सुर्ख ज़रा…

Continue

Posted on October 23, 2014 at 3:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल - (अय्यूब खान "बिस्मिल")

वज़न २२१२ २२१२ २२१२ १२

उसने दिया इनकार का पैग़ाम उम्र भर

हाँसिल नहीं कुछ बस हुआ बदनाम उम्र भर

ये मुद्दतों की प्यास है मिटती अबस तभी

अपनी नज़र से जब पिलाती जाम उम्र भर

आग़ाज़ मोहब्बत का था जब दर्द से भरा

लाज़िम मुझे सहना ही था अंजाम उम्र भर

बस एक तिरी ख्वाहिश में खोया वजूद तक

ये ज़िन्दगी भी रह गई बे-नाम उम्र भर

दिल की तिजारत दर्द से बिस्मिल किया किये

उल्फत में बस ये ही रहा एक ख़ाम…

Continue

Posted on January 5, 2014 at 8:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2121

ख़म नहीं ज़ुल्फ़ों के ये जिनको कि सुलझायेंगे आप 

उलझने हैं इश्क़ की फिर से उलझ जायेंगे आप

कौन कहता है मुहब्बत अक्स है तन्हाइयों का

हम न होंगे साथ जब साये से घबराएंगे आप

दे तो दोगे इस ज़माने के सवालो का जवाब

दिल नहीं सुनता किसी की कैसे समझायेंगे आप

जा रहे हो बे-रुखी से जान लो इतना ज़रूर

क़द्र जब होगी मुहब्बत कि…

Continue

Posted on December 7, 2013 at 2:30pm — 11 Comments

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ - हजज मुसम्मन सालिम

जहाँ से अब ज़रा चलने कि तैयारी करो बिस्मिल

वहम में जी लिए कितना कि बेदारी करो बिस्मिल

जमाने ने किसे रहने दिया है चैन से अब तक

पुरानी बात छोड़ो खुद को चिंगारी करो बिस्मिल

बुरा हो वक़्त कितना भी न घबराना कभी इस से

गया अब वक़्त गर्दिश का न दिल भारी करो बिस्मिल

ग़रीबों का दुखाना मत कभी भी दिल मेरे दोस्त

दुआ किसकी मिलेगी फिर जो ज़रदारी करो बिस्मिल

सवर जाये अगर इस से बुरा क्या है ज़रा सोंचो

कभी इस मुल्क की…

Continue

Posted on November 16, 2013 at 8:00pm — 25 Comments

Comment Wall (2 comments)

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

At 5:42am on December 9, 2013, vandana said…

आभार आदरणीय बिस्मिल जी  

At 3:36pm on July 13, 2013, Ayub Khan "BismiL" said…

bahut shukria aap sabhi admin hazraat ka ,, mujhe bazam ka hissa bankar bahut khushi hui 

 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service