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पूरे विश्व में जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है | भारत में भी धीरे-धीरे इसका चलन बढ़ता जा रहा है | इसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढती भूमंडलीकरण की अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है और पिता के प्रति प्रेम के इज़हार के परिप्रेक्ष्य में भी |

लगभग १०८ साल पहले १९०८ में अमेरिका के वर्जीनिया में चर्च ने फादर्स डे की घोषणा की थी | १९ जून १९१० को वाशिंगटन में इसकी आधिकारिक घोषणा कर दी गयी | अब पिता को याद करने का एक दिन बन गया था पर क्या पिता को याद करने का भी कोई एक दिन होना चाहिए ? मुझे तो समझ नहीं आता | यह पश्चिम की परम्परा हो सकती है पर हमारे यहाँ तो नहीं | पश्चिम में जहाँ विवाह एक संस्कार ना हो कर एक समझौता होता है, एग्रीमेंट होता है | ना जाने कब एक समझौता टूट कर दूसरा समझौता हो जाय, कुछ पता नहीं होता | ऐसे में बच्चों को अपने असली जन्मदाता के बारे में पता भी नहीं होता होगा | इसी लिए शायद पश्चिम में फादर्स डे की घोषणा करनी पड़ी होगी ताकि बच्चे अपने असली जन्मदाता को उस दिन याद करें पर हमारे यहाँ तो पिता एक पूरी संस्था का नाम है, पिता एक पूरी व्यवस्था, संस्कार है, हमारा आदर्श है | हमारे यहाँ कोई भी संस्कार पिता के बिना संपन्न नहीं होता | वही परिवार का मुखिया होता है और परिवार को वही अनुसाशन की डोर में बांधे रखता है | हम उन्हें एक दिन में कैसे बाँध सकते हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया, एक वजूद दिया, चलना, बोलना और हर परिस्थिति से लड़ना सिखाया, उनके लिए सिर्फ एक दिन ! जिनके कारण हमारा अस्तित्व है उनके लिए इतना कम समय !
मुझे याद नहीं आता कि बचपन में मैंने कोई फादर्स डे जैसा शब्द सुना था | यह अभी कुछ सालों में ज्यादा प्रचलित हुआ है जब विदेशी कंपनियों ने इस डे वाद को बढ़ावा दिया है | इतने सारे डेज की वजह से ये कंपनियां करोड़ों रूपये अंदर करती हैं और हम खुश होते हैं एक डे मना कर या शायद विदेशों की तरह हमारे यहाँ भी रिश्तों की नींव दरकने लगी है | संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं | एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है | परिवार के नाम पर पति ,पत्नी और केवल बच्चे हैं | पिता परिवार से बाहर हो चुके हैं और हाँ, माँ भी | पिता अकेले पड़ गए हैं, उनके बुढ़ापे की लाठी कहीं खो गयी है, है तो बस जीवनसाथी का साथ, वह भी भाग्यशाली पिता को |

हमारे ऊपर पश्चिमी संस्कृति हावी होती जा रही है | पिता के लिए घर में कोई स्थान नहीं ,वे बोझ लगने लगे हैं | इसी सोच के चलते हमारे देश में वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है | यहां तक की वेटिंग में लंबी लाइन लगी है उनको वृद्धाश्रमों में धकेलने की |

लोग सोशल मिडिया पर फादर्स डे के दिन स्टेटस तो डालेंगे पर पिता के पास बैठने के लिए दो घड़ी का समय उनके पास नहीं है | वह कहीं अकेले बैठे होंगे कोने में | बड़े दुःख की बात है और शर्म की भी कि जिसके बिना हम अधूरे हैं उसी को हम भूलते जा रहे हैं | अपने जीवन की सुख-सुविधा उसके संग नहीं बाँट पा रहे हैं | विदेशों में जहाँ माता-पिता को ओल्ड एज हाउस में शिफ्ट कर देने की परंपरा है, वहाँ तो फादर्स-डे का औचित्य समझ में आता है पर भारत में कहीं इसकी आड़ में लोग अपने दायित्वों से मुंह तो नहीं मोड़ना चाहते ? अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा तो नहीं पाना चाहते ? इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है |

आज जरुरत है आगे बढ़ कर उन्हें सँभालने की, उन्हें सहारा देने की, उनको जिम्मेदारियों से मुक्त करने की | कल उन्होंने हमें संभाला था, आज हमारी बारी है, उनके अकेलेपन को कुछ कम कर पाने की, उनके चेहरे पर खुशी लौटा पाने की, उन्हें वही स्नेह लौटने की जो उन्होंने हमें बचपन में दिया था | उन्हें रू० पैसों की जरूरत नहीं है | उन्हे जरूरत है हमारे थोड़े से समय की जो उनके लिए हो | जिस दिन हम सब ऐसा करने में सफल हों जायेंगे, अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से रोज थोडा सा समय उनके साथ बिताएँगे, उनकी परवाह करेंगे, स्वयं उनका ख्याल रखेगें उस दिन से हर दिन होगा -- हेप्पी फादर्स डे


मीना पाठक 

मौलिक /अप्रकाशित 

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