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दिगंबर नासवा's Discussions (471)

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"जानता था सभी लकीरों को हाथ दौलत न आनी जानी थी ... वाह राजेश्कुमारी जी ... बधाई कबूल…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"पढ़ते पढ़ते गुज़र गया शाइर,हाथ में डायरी पुरानी थी. .. वाह निलेश जी इस एक शेर ने पूरा म…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"मतले और गिरह के शेर का तो क्या कहना ... बस दिली दाद कबूल करें ... ये कुछ और शेर हैं…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल शिज्जु  जी ... कुछ शेर तो बार बार होठों पर आ रहे हैं ...  थे इराद…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"यूँ न शम्मा कोई बुझानी थी ऐ हवा तुझको शर्म आनी थी ... मतला बहुत ही कमाल का है भुवन ज…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"उम्र से पहले वो हुआ बूढ़ाउसकी बेटी हुई सयानी थी ...  हकीकत और हालात कैसे माहोल पैदा…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"हम तसव्वुर करे तिरी खुशबूलोग कहते कि रातरानी थी ... सुभान अल्ला ... लाजवाब शेर है ..…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"ट्रंक लोहे का सुरमे-दानी थी बस यही माँ की इक निशानी थी   अब जो चुप सी टंगी है खूँटी…"

दिगंबर नासवा replied Nov 28, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक - 53

415 Nov 29, 2014
Reply by भुवन निस्तेज

"आग देने वालों को इल्म भी नहीं होता ज़िस्म की जलन जलती लकड़ियाँ समझती हैं ... Dil ko ch…"

दिगंबर नासवा replied May 25, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-47

848 May 25, 2014
Reply by अरुण कुमार निगम

"भोले-भाले लोगों से वोट अब न पायेंगे आपकी सियासत को बस्तियाँ समझती हैं। Waah ... Subh…"

दिगंबर नासवा replied May 25, 2014 to "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-47

848 May 25, 2014
Reply by अरुण कुमार निगम

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२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
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दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
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"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
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"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
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"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
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"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
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Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
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रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
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