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खुद से रु ब रु होने के बाद भी
हम अपनी पहचान के लिए
आएने क्यों तलाशते हैं
आएने झलक दिखा देते हैं
जिस्मानी अक्स की
रुहानी अक्स की पहचान
हम इन में कहाँ पाते हैं

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Comment by amit on April 12, 2010 at 8:46pm
ji bilkul sahi baat hai aur bahut hi achhi rachna hai..............
Comment by Sanjay Kumar Singh on April 12, 2010 at 2:08pm
Pahaley ki tarah aek aur shandar prastuti,bahut hi badhiya Rajani jee,
Comment by Admin on April 12, 2010 at 2:01pm
जिसने भी कहा है की जहा ना पहुचे रवि वहा पहुचे कवि ,बिलकुल ठीक कहा है, आप का लिखा एक एक शब्द लगता है की अंतरात्मा की आवाज है , बहुत ही बढ़िया रचना है रजनी दीदी,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 12, 2010 at 10:02am
bahut sundar rachna hai rajani didi...hamesha ki tarah ye bhi bahut bnadhiya rachna hai....
aage bhi apki rachna ka intezaar rahega.....

Preetam Tiwary

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 12, 2010 at 9:49am
वाह दीदी वाह हमेशा की तरह ये भी रचना आपकी बहुत अच्छी है, चंद लाइनों मे ही आपने बहुत कुछ कह दिया है, बात भी बिलकुल सही है, यदि हम आइने मे अपने अस्तित्व को तलाशते है इसका मतलब हम अपने अस्तित्व को ही भुला बैठे है और हम क्या है हमे खुद ही पता नहीं है, अच्छी रचना है दीदी, आगे भी इन्तजार रहेगा ऐसी ही रचनावो का, धन्यबाद,

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