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अजब मंजर था वो..
अथाह सागर,हाथ हिलाते साहिल पर खड़े कुछ अपने
आँखों में बिछोह का दर्द लिये,
और एक चोटी सी कश्ती पर स्वआर वो
ह्रदय पीड़ा युक्त रोरो धाराओं की हलचल से व्याप्त

आँखे अश्रु रोकने के असमंजस में
धीरे धीरे दूर होती कश्ती देख
मुड़ने लगे वे सब अपने

अचानक आया सागर में तूफ़ान
कश्ती लगी डगमगाने
उसे अहसास हुआ जब तक
फिर भी पुकारा उसने उन अपनों को
पर उसकी आवाज़ लहरों से टकराकर लौट आई
"एक हाथ भी आगे न आया ज़िन्दगी कोत्थामने"...
अर्पिता सी राज
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 6:06pm

अच्छी  प्रस्तुति है टंकण त्रुटियाँ  सुधार लें | बहुत  बहुत  बधाई डॉ० अर्पिता  जी  

कृपया ध्यान दे...

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