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गुमशुदा हूँ  मैं

तलाश जारी है

अनवरत 'स्व ' की

अपना ‘वजूद’

है क्या ?

 आये खेले ..

कोई घर घरौंदा बनाए..

लात मार दें हम उनके 

वे हमारे घरों को....

रिश्ते  नाते उल्का से लुप्त

विनाश ईर्ष्या विध्वंस बस

'मैं ' ने जकड़ रखा  है मुझे

झुकने नहीं देता रावण सा

एक 'ओंकार'  सच सुन्दर

मैं ही हूँ - लगता है

और सब अनुयायी

'चिराग'  से डर लगता है

अंधकार समाहित है

मन में ! तन - मन दुर्बल है

आत्मविश्वास ठहरता नहीं

कायर बना  दिया है ....

सच को अब सच कहा नहीं जाता

चापलूसी चाटुकारिता  शॉर्टकट

ज़िन्दगी की आपाधापी की दौड़ में

नए आयाम हैं  , पहचान हैं  

मछली की आँख तो दिखती नहीं

दिखती बस है मंजिल...

परिणाम - शिखर

शून्य में ढ़केल देता है फिर ..

शून्य - उधेड़बुन चिंता - चिता

‘एकाकीपन’ तमगा मिल जाता  है

गले में लटकाए निकल लेता हूँ

अपना ‘वजूद’ खोजने

शायद अब जाग जाऊं

‘गुमशुदा’ हूँ मैं

-----------------------------------

"मौलिक व अप्रकाशित"

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

कुल्लू हिमांचल प्रदेश

६/५/२०१६

१०:५० - ११;१५ पूर्वाह्न

Views: 622

Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 13, 2016 at 11:51am

आदरणीय रामबली जी स्वागत है आप का ..रचना आप के मन को छू सकी अच्छा लगा आभार
जय श्री राधे
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 13, 2016 at 11:51am
आदरणीय रामबली जी स्वागत है आप का ..रचना आप के मन को छू सकी अच्छा लगा आभार
जय श्री राधे
भ्रमर ५
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 13, 2016 at 11:50am
आदरणीय मिथिलेश जी आभार सुन्दर सुझाव हेतु ..इस को एडिट कर दिया जाएगा
जय श्री राधे
भ्रमर ५
Comment by रामबली गुप्ता on May 12, 2016 at 5:53pm
बहुत ही उम्दा अतुकांत। बधाई स्वीकार करें आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2016 at 2:32pm

आदरणीय भ्रमर जी बढ़िया भावाभिव्यक्ति है किन्तु समानार्थी शब्दों का एक ही पंक्ति प्रयोग कथ्य को शाब्दिक किये जाने के क्रम को अनावश्यक विस्तार दे रहा है यथा -

//गुमशुदा हूँ  मैं

तलाश जारी है

अनवरत 'स्व ' को खोजने का

अपना ‘वजूद’ अस्तित्व

है क्या ? //

यहाँ तलाश और खोजने का प्रयोग हो या वजूद और अस्तित्व का.

//गुमशुदा हूँ  मैं

तलाश जारी है

अनवरत 'स्व ' की

अपना ‘वजूद’

है क्या ? //

सादर 

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