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खुला आकाश तेरा है ..... (विश्व महिला दिवस पर) //डॉ. प्राची

ये माना रात गहरी है, सुनहरा पर सवेरा है।
सलाखें तोड़ दे बुलबुल, खुला आकाश तेरा है।

तुझे जो रोकती है वो
हर इक ज़ंज़ीर झूठी है,
ज़रा झंझोड़ हर बंधन,
कहाँ तकदीर रूठी है ?
उड़ानों पर तेरा हक़ है, ये पिंजर कब बसेरा है?
सलाखें तोड़.....

ज़माने के तराजू पर
न अपने पंख अब तू तोल,
'खुले अम्बर' की परिभाषा
जो सच समझे, वही तू बोल।
ये तेरा चित्र है जिसका, तेरा दिल ही चितेरा है।
सलाखें तोड़.....

तुझे छूना है चन्दा को
तुझे किरणों पे चढ़ना है,
रवानी भर परों में खुद
तुझे ही लक्ष्य गढ़ना है।
तेरी हर साँस ने पलकों पे ये सपना उकेरा है।
सलाखें तोड़.....

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan on March 8, 2016 at 12:45pm

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