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विरह गीत (एक प्रयास)

बरसा है कैसे आँख का सावन,कैसे हुई बरसात रे साथी...........कैसे हुई बरसात
चिट्ठी में लिख दी है मैंने अपने मन की बात रे साथी..........अपने मन की बात


दिन भी गुज़रता गुमसुम गुमसुम,रात भी तारे गिनते
तेरे विरह में हम को मिले जो घाव वो सारे गिनते
तुझ को पुकारे आँख का कजरा,मेंहदी वाले हाथ रे साथी.........मेंहदी वाले हाथ


मेज़ पे रक्खी तेरी छाया,तेरी याद दिलाए
मैं जिस ओर भी देखूँ साथी,तेरी छवी लहराए
हर पल तेरी याद दिलाऐं,बीते हुए लम्हात रे साथी........बीते हुए लम्हात


कोई जतन मिलने का कर लो,नैना वाट निहारें
अपने मिलन के बीच खड़ीं हैं पर्वत सी दीवारें
मुझको पता है फिर लिख दोगे,वष में नहीं हालात रे साथी........वष में नहीं हालात

बरसा है कैसे आँख का सावन,कैसे हुई बरसात रे साथी...........कैसे हुई बरसात
चिट्ठी में लिख दी है मैंने अपने मन की बात रे साथी..........अपने मन की बात

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on November 30, 2015 at 11:27pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,मेरा गीत आपको पसंद आया ,मेरा लिखना सार्थक हुवा,आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 11:29pm

आदरणीय समर कबीर जी शानदार गीत हुआ है. आपका पहला गीत पढ़ रहा हूँ या कहें गुनगुना रहा हूँ दिल खुश हो गया 

ढेर सारी दाद और बधाई 

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