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लघुकथा – पूंछ

सीढ़ियाँ गंदी हो रही थी कविता ने सोचा झाड़ू निकल दूँ. यह देखा कर पड़ोसन ने कचरा सीढ़ियों पर सरका दिया.

बस ! फिर क्या था. कविता का पारा सातवे आसमान  पर, “ मैं इस के बाप की नौकर हूँ. नहीं निकाल रही झाड़ू,” बड़बड़ाते हुए कविता ऊपर आई , “ साली अपने को समझती क्या है ? कभी सीढ़ियों पर पानी डाल देगी. कभी लहसन का कचरा. कभी कुछ. मैं इस की नौकर हूँ जो रोजरोज सीढ़ियाँ साफ करती रहू. साली अपने को न जाने क्या समझती है ?

“ क्यों जी. आप बोलते क्यों नहीं.” उस ने पति के हाथ से अख़बार छीन लिया.

“ क्या बोलू ?”

“ वो छिनाल ! एबलापना कर रही है. आप कुछ करते क्यों नही ?”

“ एक बात कहूँ ?”

“ अब तुम बाकि क्यों रखो. कह दो. कीचड़ में कंकर फेकोगे तो कीचड़ ही उड़ेगा.”

“ नहीं. वो नहीं. मैं तो कह रहा था कि कुत्ते की पूछ छः माह तक भोंगली में रख दो तो भी टेडी की टेडी ही रहती है.”

----------------

मौलिक व अप्रकाशित 

                            

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Comment by Omprakash Kshatriya on September 25, 2015 at 5:27pm

आदरणीय  जवाहर लाल जी आप की बात उपयुक्त है . आगे से ध्यान रखूँगा. 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 24, 2015 at 8:49pm

मेरा सिर्फ इतना निवेदन है - अवांछित गालियों के प्रयोग के बिना भी बातें कही जा सकती थी ...पंच लाइन उपयुक्त लगी आदरणीय om prakash जी!

Comment by Omprakash Kshatriya on September 23, 2015 at 8:00am

आदरणीय तेज वीर जी आप को लघुकथा सुन्दर लगी. यह पढ़ कर मेहनत सफल हो गई.

Comment by TEJ VEER SINGH on September 22, 2015 at 8:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय ओमप्रकश क्षत्रिय   जी!बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण लघुकथा!

कृपया ध्यान दे...

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