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मित्रता की परिभाषा (लघुकथा)

काम से शहर आते वक्त धीरज ने मोतीचूर के लड्डू भी ले लिए अपने कमिश्नर हो चुके बचपन के मित्र नील के लिए । उत्साह भरे कदमों से जैसे ही बंगले में कदम रखा कि गार्ड ने रोक लिया । गार्ड के रोके जाने के बाद भी उसे उम्मीद थी कि उसका नाम सुनते ही नील दौड़ा आयेगा लेकिन गार्ड की नजरों के गहरे भाव नें मित्र की व्यस्तता की सूचना के साथ ही वो भ्रम भी तोड़ दिया। 
लड्डू के डिब्बे पर नजर गई तो वो सकुचा उठा ।गार्ड मानों उसे ताड़ चुका था ।
"साहब तो काजू कतली के सिवा कोई मिठाई नहीं खाते है । "
"ओह , लो भैया तुम ही रख लो । अपने बाल - बच्चों को खिला देना ।"
उसे मायूस कदमो से लौटते देख गार्ड बुदबुदाया
"अब दोस्ती के मायने बदल गए हैं-आज का कृष्ण अपने सुदामा के आने का संदेसा पाकर नंगे पाँव दौड़ा नहीं चला आता।"

.

( मौलिक एवम अप्रकाशित )
ज्योत्सना

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Comment by jyotsna Kapil on September 6, 2015 at 4:09pm
आ.अर्चना त्रिपाठी जी आपने न सिर्फ मेरी कथा को समय दिया अपितु सराहा भी।इसके लिए आपकी हृदयतल से आभारी हूँ।आपके शब्द मेरे लिए अनमोल हैं।
Comment by jyotsna Kapil on September 6, 2015 at 4:07pm
आपने कथा को समय दिया और सराहना की।इसलिए आपकी हृदयतल से आभारी हूँ आ.मिथिलेश वामनकर जी।आपकी सराहना ने मेरा मनोबल बहुत बढ़ाया है।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 6, 2015 at 4:07pm

बढिया ! वाह !! .. 

आजके सुदामा को जान ही लेना चाहिये कि उसे कृष्ण के पास नहीं जाना है.

शुभ-शुभ

 

Comment by Archana Tripathi on September 6, 2015 at 12:47am
बहुत ही बढ़िया परिभाषा रची हैं आधुनिक युग के मित्रता की।हार्दिक बधाई आपको आदरणीय ज्योत्स्ना जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 5, 2015 at 9:07pm

आदरणीया ज्योत्स्ना जी, मित्रता की बदलती परिभाषा को बहुत बढ़िया शाब्दिक किया है आपने. इस बेहतरीन लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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