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अदृश्य भय - लघुकथा (मिथिलेश वामनकर)

“आज बहुत लेट हो गई ? ’मम्मा ऑफिस से कब आएगी’, पूछ-पूछ कर परी ने कबसे परेशान कर रखा है..”
सासू माँ की बगल में सुनंदा की तीन साल की बेटी चुपचाप अपनी गुड़िया के साथ खेल में मग्न थी.
“मधुकर भैया है न, इनके दोस्त, उनके यहाँ बेटी हुई है, बस हॉस्पिटल गई थी. इनका फोन आया था कि वो नहीं जा पाएंगे इसलिए मुझे जाना पड़ा.” - सुनंदा की आवाज़ सुनकर परी दौड़ती हुई अपनी मम्मा से लिपट गई.
“अरे उसकी तो पहले ही एक लड़की है न ?... काश इस बार लड़का हो जाता.. अच्छा रहता.”  कहती हुई सासू माँ ने सुनंदा से लिपटी हुई परी को कुछ ऐसी नज़रों से देखा कि सुनंदा भीतर तक काँप गई.

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 10:28pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी, लघुकथा के प्रयास पर आपकी सराहना पाकर संतुष्ट  हुआ.

//कभी अदृश्य रूप से आचरणों द्वारा ज़ाहिर होता ये चुभता भाव... एक माँ के लिए कैसा रूह कंपा देने वाला होता होगा//

लघुकथा के मर्म के तक पहुंचकर सार्थक प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 23, 2015 at 9:42pm

समाज में रचा बसा हृदय बेधी कड़वा सत्य

बेटियों के जन्म के प्रति , बेटियों की स्वीकार्यता के प्रति कभी ज़ाहिर रूप से सामने गरजता और कभी अदृश्य रूप से आचरणों द्वारा ज़ाहिर होता ये चुभता भाव... एक माँ के लिए कैसा रूह कंपा देने वाला होता होगा

बहुत खूबसूरत और सार्थक लघुकथा आ० मिथिलेश जी

हार्दिक बधाई  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 1:03pm

आदरणीय जवाहर जी लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 23, 2015 at 11:32am

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति हुई है शिल्प और कथ्य दोनों ही दमदार! बधाई आदरणीय मिथिलेश जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 8:37pm

आदरणीय महर्षि जी लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. 

Comment by maharshi tripathi on July 22, 2015 at 8:09pm

एक और सामाजिक अपराध को दिखाती आपकी इस लघुकथा पर ,हार्दिक बधाई आ.सर जी |सही है मानसिकता जब तक नही बदलेगी ,भेदभाव  बना रहेगा |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 3:44pm

आदरणीया कांता जी, अपने लघुकथा के शिल्प पर सकारात्मक प्रतिक्रिया की तो थोड़ा आश्वस्त हुआ हूँ.  लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 12:45pm

आदरणीया प्रतिभा जी लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. दरअसल ये डर ऑफिस जाने वाली मम्माओं को ही अधिक लगता है. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 12:44pm

आदरणीय राहुल जी लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 12:41pm

आदरणीया सीमा जी लघुकथा की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. आपने सही कहा, विषय तब तक चर्चा के योग्य बना ही रहेगा जब समाज पर उसकी काली छाया बाकी है और हमारा दुर्भाग्य है कि कन्या भ्रूण-हत्या और लड़कियों के प्रति सोच के बदलाव की गति बहुत धीमी हैं. संभवतः यही कारण है कि इस विषय पर लगातार लिखा जा रहा है. विषय चयन पर आपका अनुमोदन पाकर आश्वस्त हुआ हूँ. बहुत बहुत आभार आपका.

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