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ग़ज़ल ; यकायक चराग़ों को क्या हो गया है

122 122 122 122

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

चलो और दिन तो है बाकी, रूकें क्यों
शजर पे अभी नूर देखो झुका है.

इसी आरज़ू में कटी ज़िन्दगी ये
पता तो चले क्या हमारा हुआ है.

अभी छू नहीं सर्द हांथों से ऐ शब
अभी तो मुझे उसने मन से छुअा है.

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.

- श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 1092

Comment

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Comment by shree suneel on May 15, 2015 at 10:40pm
आदरणीय हरि प्रकाश जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया..
Comment by shree suneel on May 15, 2015 at 10:38pm
शुक्रिया.. आदरणीय केवल प्रसाद जी
Comment by shree suneel on May 15, 2015 at 10:35pm
शुक्रिया.. आदरणीय मदन मोहन जी.
Comment by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 9:18pm

शानदार  रचना आदरणीय  shree suneel  जी ,

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है...बहुत बढ़िया 

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.....बहुत खूब ! हार्दिक बधाई आपको  

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 15, 2015 at 8:13pm

आ0 सुनील भाई जी,  बेहतरीन गज़ल के लिये दाद कुबूल करे. सादर

Comment by Madan Mohan saxena on May 15, 2015 at 5:35pm

"यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे ,जले फिर ,ये किसकी दुआ है "
अच्छी ग़ज़ल

Comment by shree suneel on May 15, 2015 at 4:48pm
आदरणीय समर कबीर सर, मार्गदर्शन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.
फिर तो मतला बदलना हीं होगा और आपका सुझाव भी मुझे कुबूल है. जल्द हीं सही करता हूँ. पुनः धन्यवाद आदरणीय.
Comment by shree suneel on May 15, 2015 at 4:32pm
शुक्रिया.. शुक्रिया.. आदरणीय अयूब खान साहब.
Comment by Samar kabeer on May 15, 2015 at 2:29pm
जनाब श्री सुनील जी आदाब ,"शुआ" का क़ाफ़िया नहीं लिया जा सकता ,जैसा कि आप ख़ूब जानते हैं कि सही शब्द "शुआअ" है ,आपके मतले के लिये एक सुझाव है अगर आप क़ुबूल करें तो :-

"यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे ,जले फिर ,ये किसकी दुआ है "
Comment by Ayub Khan "BismiL" on May 15, 2015 at 2:06pm

khooooob bahut umdaa janaab behtreen gazal hui hai 

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