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हर जगह हर घडी बस तू साथ है 

जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है

 छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को

वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है

मेरे  नये संसार में बस तू साथ है

प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है

बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले 

उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है

मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है

इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है

यूँ  तो खुशियों के हमदर्द  सब हैं मगर 

 मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ है 

सावन का असर है जब तू साथ है 

यौवन भी अजर है जब तू साथ है 

ज़िन्दगी की  मेरी कमाई हो तुम

मौत का भी क्या डर है जब तू साथ है ||

***************************************

"मौलिक व अप्रकाशित " 

Views: 446

Comment

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Comment by maharshi tripathi on December 27, 2014 at 6:50pm

छमा करें, आ.मिथिलेश जी ,गलती से 2 बार पोस्ट हो गयी है |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 26, 2014 at 10:14pm

आदरणीय महर्षि  भाई जी एक ही रचना दो बार क्यों पोस्ट कर रहे है -

1- http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:598343

2- http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:598580

Comment by somesh kumar on December 25, 2014 at 11:16pm

ईश्वर /माँ /पत्नी  कोई भी हो सकता है जो हमेशा आप के जीवन को प्रेरित करता है |साथ रहता है |मंच पर शायद ये दूसरी रचना है आपकी ,अच्छा प्रयास है ,बस अभ्यास करते रहें |

कृपया ध्यान दे...

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