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अक्षत,हल्दी छूकर सपने.....

अक्षत,हल्दी छूकर सपने, द्वारे-द्वारे जाएंगे.
शायद कुछ लौटे आमंत्रण,अब स्वीकारे जाएँगे.
                               **
जबसे कोई मौन ,दृगों पर, होकर एकाकार बँटा,
मन के भीतर जाने क्या-क्या,जाने कितनी बार बँटा.
गीतों के घर , मुझसे पहले, ये बँटवारे जाएँगे.
                               **
पूछे दो बूंदों का सागर, पनघट रीत कहाँ बैठा है,
दिखतीं जहाँ परिधियाँ केवल, मेरा मीत वहां बैठा है.
नहीं पहुचती जहाँ कल्पना,क्या हरकारे जाएँगे.
                              **
पलक- पाँवडों की पीड़ा ने, विकल किया फिरसे तन-मन,
बाहर खुशबू , भीतर-भीतर,एक सुलगता चन्दन वन.
कैसे अंगारों पर चलकर ,दिन, पखवारे जाएँगे.
                              **
काँधों पर सूरज को ढ़ोया, आँखों में बरसात कटी,
आते-जाते दिन बीता और,गाते-गाते रात कटी .
लेकर सजल उनींदी आँखें ,हम भिनसारे जाएँगे.
                  **************  

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Comment

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Comment by राजेश शर्मा on April 26, 2011 at 5:53pm
 बहुत-बहुत धन्यवाद् अमित जी.
Comment by अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’ on April 26, 2011 at 11:11am

सुन्दर गीत और उतना ही अच्छा उपसंहार! बधाई!

सादर

Comment by राजेश शर्मा on March 4, 2011 at 4:12am
धन्यवाद् "ताहिर "जी, 
Comment by विवेक मिश्र on March 3, 2011 at 11:33pm
इसे कहते हैं 'सुन्दर प्रवाह के साथ संजोये गए सुन्दर भाव'. मुखड़े से लेकर अंतरे तक हरेक पंक्ति मंत्रमुग्ध करती है. हार्दिक बधाई.
Comment by राजेश शर्मा on March 3, 2011 at 7:37pm
बागी जी , वंदना जी, रश्मि प्रभा जी,रचना पर प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत आभार. 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 2, 2011 at 3:13pm
काँधों पर सूरज को ढ़ोया, आँखों में बरसात कटी,
आते-जाते दिन बीता और,गाते-गाते रात कटी .
बहुत खूब , बेहद संजीदा रचना है , कोट किया हुआ पक्ति मुझे बहुत ही भाया , इस खुबसूरत अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार कीजिये आदरणीय राजेश शर्मा जी |
Comment by rashmi prabha on March 2, 2011 at 12:45pm
काँधों पर सूरज को ढ़ोया, आँखों में बरसात कटी,
आते-जाते दिन बीता और,गाते-गाते रात कटी .
बहुत बढ़िया 

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