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ग़ज़ल - हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी

१२१२      ११२२      १२१२     ११२  

हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी

गुलों की बात छिड़ी और उनको खार लगी

बहुत संभाल के हमने रखे थे पाँव मगर

जहां थे जख्म वहीं चोट बार-बार लगी

कदम कदम पे हिदायत मिली सफर में हमें

कदम कदम पे हमें ज़िंदगी उधार लगी

नहीं थी कद्र कभी मेरी हसरतों की उसे

ये और बात कि अब वो भी बेकरार लगी

मदद का हाथ नहीं एक भी उठा था मगर

अजीब दौर कि बस भीड़ बेशुमार लगी

संजू शब्दिता मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:47am

आदरनिया गीतिका जी आपको सक्रिय देखना सुखद है । ग़ज़ल अनुमोदन हेतु आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:43am

आदरणीय सौरभ सर मैं स्वयं इस ग़ज़ल पर देर से आने के लिए आपसे व सभी सुधिजनों से क्षमा चाहती हूँ । इलाहाबाद में न होने के कारण ऐसा हुआ । प्रस्तुत ग़ज़ल के प्रति  आप सभी का स्नेह देखकर मैं अभिभूत हूँ । आपने इस ग़ज़ल को आगामी गज़लों के लिए मानक कह कर इसका कद बढ़ा दिया है और मेरे समक्ष ज्यादा बेहतर करने की चुनौती भी खड़ी कर दी है । मैं इसके लिए आपका आभार व्यक्त करती हूँ ... आपकी टिप्पणियाँ सदैव ही मुझे अच्छा करने के लिए प्रेरित करती हैं ...

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:32am

आदरनिया अन्नपूर्णा  जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:31am

आदरणीय वीनस जी ग़ज़ल पर आने हेतु आपका आभार । आपकी टिप्पणी का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है । आपका सुझाव अच्छा है पर उसे प्रयोग में लाने पर एक शेर  में तकाबुले -रदीफ़ की समस्या तो अन्य में काल भ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी । बहरहाल आपको ग़ज़ल शानदार लगी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:22am

आदरणीय देवराज जी , आदरणीय नीलेश जी ,आदरणीय लून करन जी आप सभी का हृदय से धन्यवाद

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:20am

आदरणीय नीरज नीर जी ,आदरनिया राजेश जी ,आदरणीय विजय निकोर जी ,आदरणीय रमेश सचदेव जी ग़ज़ल पर आप सभी की उपस्थिति मेरा हौंसला बढ़ा रही है । आप सभी की सहृदयता हेतु हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ .

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:14am

आदरणीय ram shiromani pathak जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by sanju shabdita on June 15, 2014 at 11:13am

आदरनिया सरिता जी आपको मेरी ग़ज़ल अच्छी लगती है ,यह मेरे लेखन की सार्थकता है । मैं आपकी सदाशयता से अभिभूत हूँ ।

मेरी ग़ज़ल कभी miss न करने के लिए आपका हृदय से आभार ।

Comment by वेदिका on June 15, 2014 at 4:39am
हमारी बात उन्हें इतनी नागवार लगी
गुलों की बात छिड़ी और उनको खार लगी//

लाजवाब कहन, गुलों की बात की भी और उनकी समझ की भी।
दिली दाद प्रेषित है, स्वीकारिये प्रिय संजू जी!
Comment by LOON KARAN CHHAJER on June 7, 2014 at 4:43pm

बहुत संभाल के हमने रखे थे पाँव मगर

जहां थे जख्म वहीं चोट बार-बार लगी

------संजू  जी बहुत  खूब लिखा  है आपने बधाई   .

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