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कविता -

शरीर में चुभे हुए काँटे

जो शरीर को छलनी करते हैं;

वह टीस 

जो दिल की धड़कन

साँसों को निस्तेज करती है

 

यह तुम्हें आनंद नहीं देगी

प्रेम का कोरा आलाप नहीं यह

वासना में लिपटे शब्दों का राग नहीं

छद्म चिंताओं का दस्तावेज़ नहीं

इसे सुनकर झूमोगे नहीं

 

यह तुम्हें गुदगुदाएगी नहीं

सीधे चोट करेगी दिमाग पर

तड़प उठोगे

यही उद्देश्य है कविता का

 

रात के स्याह-ताल पर 

नृत्य करने वाले नर-पिशाचों के लिए

नहीं होती कविता

 

कविता पैदा करती है

जिंदा लोगों में झुरझुरी

एक सिहरन!

           - बृजेश नीरज 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1317

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Comment by vandana on April 20, 2014 at 6:19am

छद्म चिंताओं का दस्तावेज़ नहीं

इसे सुनकर झूमोगे नहीं

 

यह तुम्हें गुदगुदाएगी नहीं

सीधे चोट करेगी दिमाग पर

बहुत प्रभावशाली पंक्तियाँ आदरणीय बृजेश जी 

Comment by बृजेश नीरज on April 19, 2014 at 8:05pm

आदरणीय अरुण भाई आपका बहुत-बहुत आभार!

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 19, 2014 at 5:32pm

आदरणीय ब्रिजेश भाई जी बहुत ही शसक्त प्रभावशाली रचना एक एक पंक्ति सीधे सीधे दिल में उतर गई, अंतिम बंद में आपने बहुत कुछ समाहित कर दिया है. मेरी ओर से बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2014 at 7:30pm

आदरणीय गिरिराज जी बहुत-बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2014 at 7:30pm

आदरणीय नीरज जी आपका हार्दिक आभार! 

//रात के स्याह-ताल पर// भाई जी, सही है! कोई त्रुटि नहीं है!

Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2014 at 7:29pm

आदरणीय प्रदीप जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 18, 2014 at 5:09pm

आदरणीय नीरज भाई , बौत खूबसूरत कविता , और उससे खूब सूरत कविता की परिभाषा और उद्देश्य ! आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Neeraj Neer on April 18, 2014 at 3:39pm

कविता पैदा करती है

जिंदा लोगों में झुरझुरी.. बहुत सही कहा.. .. बहुत उत्कृष्ट कविता.. स्याह-ताल , या स्याह  तल देख लीजियेगा.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 18, 2014 at 2:16pm

कविता पैदा करती है

जिंदा लोगों में झुरझुरी

एक सिहरन!

सादर बधाई आदरणीय 

Comment by बृजेश नीरज on April 18, 2014 at 8:42am

आदरणीया कुंती जी आपका बहुत-बहुत आभार!

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