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चिन्दियाँ इतिहास की, रूहों तलक फिर जाएँगी ग़ज़ल (राज )

२१२२  २१२२ २१२२  २१२ 

रोक लो तूफ़ान चिंगारी भड़क फ़िर जाएँगी

नफ़रती लपटें जमीं से अर्श तक फ़िर जाएँगी

 

इन दरारों पे जरा आँचल बिछा कर छाँव दो   

आंच पाकर बैर की वरना दहक फ़िर जाएँगी

 

अम्न- ओ-इंसानियत से चूर थी  गलियाँ यहाँ 

देख वो अपने उसूलों से भटक फ़िर जाएँगी  

 

खाई जाती थी कसम जो  दोस्ती के दरमियाँ 

उस वफ़ा की पाक़  मीनारें चटक  फ़िर जाएँगी

 

फिर झडेंगे शाखों से पत्ते ख़जां आये बिना   

बिजलियाँ जब उन दरख्तों पे कड़क फ़िर जाएँगी

 

यास में ग़म दर्द की ख़ुर्शीद ढक ता  जाएगा

चैन की खामोश दीवारें दरक  फ़िर जाएँगी

 

 

जल उठेगा ताज सुलगेगा हिमालय का बदन 

चिन्दियाँ इतिहास की, रूहों तलक फ़िर जाएँगी

 

ख़त्म हो गर ‘राज’ इनकी दुश्मनी की फितरतें 

ये  फ़सुर्दा क्यारियाँ दिल की महक फिर जाएँगी 

अर्श=आकाश

ख़जां=पतझड़

ख़ुर्शीद=सूर्य

यास=धुंध

फ़सुर्दा=मुरझाई हुई  

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

_____________

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 8, 2014 at 2:17pm

प्रिय मीना पाठक जी आपका तहे दिल से आभार. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 8, 2014 at 2:17pm

जीतेन्द्र गीत जी ग़ज़ल आपको पसंद आई उसके शेर आपको प्रभावित कर सके मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Meena Pathak on April 8, 2014 at 1:48pm

क्या बात है .... बहुत खूब ,, बधाई आप को | सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 8, 2014 at 12:52pm

फिर झडेंगे शाखों से पत्ते ख़जां से पहले  

 बिजलियाँ जब उन दरख्तों पे कड़क जाएँगी............वाह! कमाल का शेर हुआ

 

यास में फिर दर्द की ख़ुर्शीद ढक जाएगा

चैन की खामोश दीवारें दरक  जाएँगी.........विशेष बधाई, इस शेर पर

बहुत सुंदर गजल कही आपने आदरणीया राजेश जी, दिली दाद कुबूल करें. आपके द्वारा दिए शब्दों के अर्थ से हम जैसे पाठकों को बहुत सहायता मिलती है.

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