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प्रथम प्रयास ............

1-) देह लता प्रभु दीन्ह है, काहे करत गुमान,

पर सेवा उपकार कर ,तब हीं पावे मान ।

2- ) सुत, दारा अरु बन्धु सब, स्वारथ को संसार,

भज लो साईं राम को, खुद का जनम संभार ।

3- ) मन मैला तन साफ है, क्यों फैलाये जाल ,

हरी को भावत साफ मन, लिखलो अपने भाल ।

4-) मंदिर, पूजा ,यज्ञ,तप, ऊपर का व्यापार ,

मन मंदिर नित झाढ़ लो, पाओगे प्रभु द्वार ।

5-) चौरासी भटकत फिरयो,खूब मिलो परिवार ,

कटु वचनन कों बोल कर, करते रहे बिगार ।

6-)आखें जन का आईना, देखो तो चितलाय,

ह्रदय की लौ जान सब, बिना कछु किये उपाय ।

7- ) दीपक उर का बार कें, बैठी सांझ सकार ,

हरी आवन कि वाट में, नैना थके हमार ।

8-) प्रभु का माया जाल है, समझो वाकी चाल ,

जाके उसके सामने, कहना होगा हाल ।

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 11, 2014 at 11:20pm

सुंदर है दोहावली, गहन बड़े हैं भाव |
यदि सब इनको मान ले, नहीं रहेगा घाव ||
कहीं कहीं व्यतिरेक है, टंकण का अवरोध |
बहुत बधाई आपको, थोडा कर लें शोध ||
आदरणीया इस प्रथम प्रयास में ही आपने भक्ति को सुन्दर ढंग से मंडित किया है..

Comment by S. C. Brahmachari on March 11, 2014 at 10:08pm
बहन कल्पना मिश्रा बाजपेयी जी
प्रथम प्रयास मे ही आपके हाथ आठ सुंदर मोती दोहों के रूप मे आए हैं , हार्दिक बधाई !
मन मंदिर नित झाड लो प्रभु पाओगे द्वार - क्या बात है - सभी दोहे एक से बढ़कर एक । भविष्य मे सागर से मोती चुन चुन कर लाती रहें - शुभ कामनाएँ स्वीकार करें ।

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