For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मेरी अनकही बातों पर ऐतबार न कर.

जमाना बेताब है मुश्किलें पैदा करने को,

मेरी अनकही बातों पर ऐतबार न कर.

बढ़ते रहे दरमियाँ दिलों के बीच,

चाहत ये जमाने की कामयाब न कर.

एक लकीर है हमारे और उसके बीच,

डर है गुम  होने का, उसे पार न कर.

कल का सूरज किसने देखा है,

आ भर ले बाहों में इन्कार न कर.

यक़ीनन ढला ज़िस्म फौलाद के सांचें में,

पर दिल है शीशे का, तू वार न कर.

शक अपनों पर, परायों के खातिर,

यकीं नहीं है तो फिर प्यार न कर.

........मौलिक व अप्रकाशित..........

Views: 692

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 12:03pm

नीरज जी...................हम भले ही इस भ्रम में रहे कि हम करता है. परन्तु हम करता नहीं है ..............यह सहज तरीके से अनुभव किया जा सकता है...........इसमे कृष्ण को कहने और न कहने का सवाल ही नहीं उठता ...............आप मेरे लिए जितना सच है उतना ही कृष्ण मेरे लिए झूठ...............

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 11:35am

आदरणीय सौरभ जी......................बिलकुल..............आप सभी का बेशकीमती समय मिला हार्दिक आभार!..............

Comment by Neeraj Nishchal on February 4, 2014 at 11:35am

वाह वाह वाह अनिल भाई क्या बात कह दी
लिखते नहीं हैं लिख जाता है
यही तो मै भी कहना चाहता हूँ जिस तरह जीवन प्रभु का प्रसाद है हमारा प्रयास नही
उसी तरह कविता भी प्रभु का प्रसाद ही है हमारा प्रयास नही
लाइन में लग जाते हैं मिल जाता है , ये तो परम धन्यभाग है जैसे गीता में कृष्ण कहते हैं
कर्ता न बनो बल्कि हो जाओ शायद यही विकर्म है यही स्वधर्म ।

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 11:32am

आदरणीया!

........शुक्रिया

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 11:31am

आदरणीय नीरज जी ..................आपको अच्छा लगा हो यह अलग बात है पर मेरे लिए यह अच्छा नहीं क्योंकि इससे बेहतर हो सकता था और वो कला इस मंच से अपने अन्दर उतारनी है......

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 11:29am

आदरणीय गिरिराज जी.......................शुक्रिया ...........प्रयास किया ही नहीं मैं बस युहीं लिख गया...............

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 4, 2014 at 11:27am

आदरणीय अरुण जी.................................हार्दिक आभार........................जी अभी मुझे किसी भी रचना के बारे में कोई जानकारी नहीं है ....................मैं लिखता नहीं बल्कि लिख जाता है.............यह दिपदीय है यह भी मुझे यहाँ आकर मालूम हुआ......जो मेरे लिए अच्छी बात है. उम्मीद करता हूँ आगे भी बहुत कुछ आप लोगों से सिखने को मिलेगा.......


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 1, 2014 at 2:14am

बहुत खूब भाईजी..

भाई अरुनजी के कहे पर अवश्य ध्यान दीजियेगा. आपकी संभावनाओं को अर्थ मिल जायेंगे.

शुभ-शुभ

Comment by annapurna bajpai on January 27, 2014 at 6:05pm

आ0 अनिल जी सुंदर द्विपदीय आपको बहुत बधाई । 

Comment by Neeraj Nishchal on January 27, 2014 at 5:30pm

भाई अनिल जी नमस्कार बहुत अच्छा लिखा है ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
13 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
23 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
yesterday
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service