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!!! चाल ढार्इ घर चले अब !!!

बन फजल हर पल बढ़े चल,
दासता के देश में अब।
रास्ते के श्वेत पत्थर
मील बन कर ताड़ते हैं
दंग करती नीति पथ की,
चाल ढार्इ घर चले अब।1

भूख पीड़ा सर्द रातें
राह पर अब कष्ट पलते
भ्रूण हत्या पाप ही है
राम के बनवास जैसा
साधु पहने श्वेत चोला
चाल ढार्इ घर चले अब।2

रोजगारी खो गर्इ है
रेत बनकर उड़ चुकी जो
फिर बवन्डर घिर रहा है
घूस खोरी सी सुनामी
दर-बदर अस्मत हुर्इ पर
चाल ढार्इ घर चले अब।3

कत्ल का अंजाम क्या है?
बस रर्इसों के सफर सम
तंत्र का यह श्वेत पत्रक
प्रेम का इतिहास कहता
फिर रसायन रस पढ़ा कर
चाल ढार्इ घर चले अब।4

के0पी0सत्यम-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on December 19, 2013 at 6:16pm

आदरणीय सविता जी आपका बहुत बहुत आभार। सादर,

Comment by Meena Pathak on December 19, 2013 at 2:06pm

बहुत सुन्दर आदरणीय केवल जी | सादर बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on December 19, 2013 at 1:22pm
सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये बधाई......
Comment by annapurna bajpai on December 19, 2013 at 1:14pm

बहुत सुंदर !! आ० केवल भाई जी । 

Comment by savitamishra on December 19, 2013 at 10:23am

सुन्दर

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