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मैं एकलव्य नहीं (लघुकथा)

परीक्षाएं निकट थीं लेकिन टीचर पिछले कई दिनों से क्लास से गायब थे. पढ़ाई का बहुत हर्जा हो रहा था जिसे देखकर उसे बेहद गुस्सा आता. रह रह कर उसके सामने अपनी विधवा बीमार माँ का चेहरा घूम जाता, जो लोगों के घरों में झाड़ू पोछा कर उसे पढ़ा रही थी. आखिर उस से रहा न गया और वह शिकायत लेकर प्रधानाचार्य के पास जा पहुंचा।

 “उस कक्षा में और भी तो विद्यार्थी है, सिर्फ तुम्हें ही शिकायत क्यों है।”
“क्योंकि मैं एकलव्य नहीं हूँ सर।”

(मौलिक और अप्रकाशित)    

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Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 7:04pm

आदरणीय वंदना तिवारी जी व आदरणीय वंदना जी
लघुकथा पर आपकी सृजनात्मक टिप्पणी हेतु हृदय तल से धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 7:00pm

श्रद्धेय सौरभ भाई,
सादर प्रणाम । आपकी टिप्पणी का बेसब्री से इंतजार था। आपको लघुकथा पसंद आई मेरा प्रयत्न सफल हुआ। आपका आशीर्वाद यदि इसी तरह मिलता रहा तो आगे भी लिखने की कोशिश करता रहूंगा। काश ! जैसे गूढ़ शब्द आप प्रयोग करते है वो मुझे भी प्रयोग करने आ जाए या मुझे सूझ ही जाएं । गुस्ताखी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं। धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:55pm

प्रिय शुभ्रांशु भाई,
आप स्वयं एक सफल लघुकथाकार है, आप से वाह वाही प्राप्त करना आन्नदमयी है। धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:53pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी, अरून शर्मा जी एवं डाॅ. आशुतोष जी,
आपकी सृजनात्मक टिप्पणीयों हेतु हृदय से आभार ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:51pm

आदरणीय गीता वेदिका जी,
आपकी टिप्पणी हेतु धन्यवाद। इस मंच पर आप जैसे गुणीजनों की उत्साहपूर्वक टिप्पणीयां जबरदस्ती और लिखने पर मजबूर करती है। धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:49pm

आदरणीय अन्नापूर्णा वाजपाई जी,
सादर । आप जैसे गुणीजनों से जब स्नेह मिलता है तो रोम-रोम पुलकित हो उठता है मानो लिखना सफल हुआ। धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:47pm

आदरणीय शिज्जु शकूर जी,
लघु कथा पसंद करने पर धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:45pm

आदरणीय डाॅ. गोपाल जी,
आपकी बधाई सिर माथे पर। लघु कथा पसंद करने पर धन्यवाद ।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:43pm

प्रधान सम्पादक महोदय एवं ज्येष्ठ भ्राता श्री योगराज जी
सादर चरण वंदना ।
आपकी तो केवल एक वाह ही नए रक्त का संचार कर देती है। रचना पसंद करने
के लिए दिल से धन्यवाद, आशा है भविष्य में भी आपका आशीर्वाद मिलता रहेगा।

Comment by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 6:40pm

आदरणीय कुंती जी,

सादर प्रणाम

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