For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चोटिल अनुभूतियाँ

कुंठित संवेदनाएँ

अवगुंठित भाव

बिन्दु-बिन्दु विलयित

संलीन

अवचेतन की रहस्यमयी पर्तों में

 

पर

इस सांद्रता प्रजनित गहनतम तिमिर में भी

है प्रकाश बिंदु-

अंतस के दूरस्थ छोर पर

शून्य से पूर्व

प्रज्ज्वलित है अग्नि

संतप्त स्थानक 

 

चैतन्यता प्रयासरत कि

अद्रवित रहें अभिव्यक्तियाँ

 

फिर भी

अक्षरियों की हलचल से प्रस्फुटित

क्लिष्ट, जटिल शब्दाकृतियों का चेहरा

पिघला है-

व्युत्पन्न अदृश्य धारा के पदचिन्ह

शेष हैं अभी

 

सतर में अर्थ की तलाश है

 

- बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

Views: 1410

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Vindu Babu on December 22, 2013 at 7:52am

सर शायद इस शब्द पर चर्चा नहीं हुई होगी!

खैर..

निष्कर्ष निकल आया आदरणीय ,यह पाठक पर आधारित है,यदि पाठक ने स्वीकार क्र लिया तो आगे चलकर रचनाकार के रूप में प्रयोग करेगा ही।

आपकी सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिए सादर आभार और परों को खोलते हुए के सश्रम,उन्नत सम्पादन के लिए भी।

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 21, 2013 at 11:36am

//जब शब्द अर्थहीन न हो और उसका प्रयोग भी प्रचलित हो चला हो, तो वह शब्द सर्वमान्य हो जाता है। //

नहीं, यह न कहें कि यह शब्द प्रचलित हो चला है. कवि द्वारा कौतुक करने के लिहाज पर अनुमन्य अवश्य है.

यह कवि की अपनी कलाकारी है जिसे मानने न मानने का अधिकार पाठक को ही है. भाई बृजेशजी की इस रचना की गहराई और इसका गहन रूप ही वे कारण हैं कि मैं इस शब्द को अपने सम्पादन में मान दे बैठा. उसके साथ मैंने छेड़छाड़ नहीं की.

आपको शायद जानकर सुखद आश्चर्य होगा, कि परों को खोलते हुए में सम्मिल्लित भाई बृजेशजी की प्रत्येक रचना पर सापेक्ष संवाद में एक-एक शब्द पर विचार हुआ था. तब मैं लखनऊ प्रवास में था और भाईजी के पास मेरे साथ बिताने के लिए इकट्ठे पाँच घण्टे थे ! खूब-खूब चर्चा हुई थी उनकी प्रत्येक रचना पर ! रचना के एक-एक बिम्ब पर ! एक-एक शब्द को लेकर ! शिल्प और कहन पर !
सादर

Comment by Vindu Babu on December 21, 2013 at 7:56am

जी आदरणीय!

सम्मोहिनी में आबद्ध रहा था...अब नहीं आदरणीय!

जहाँ तक मैं जानती हूँ सर,जब शब्द अर्थहीन न हो और उसका प्रयोग भी प्रचलित हो चला हो, तो वह शब्द सर्वमान्य हो जाता है।

तो इस शब्द के प्रयोग को मान्यता दी जानी चाहिए की नहीं?

क्षमा करें आदरणीय ये प्रश्न आपसे ही इसलिए कर रही हूँ क्योकि दोनों स्थितियां (परों को खोलते हुए का सम्पादन और यहाँ भी इस शब्द पर आपका ही ?)आपसे ही सम्बन्धित हैं।

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 2:10pm

//जब चैतन्यता कोई शब्द नहीं होता तो आपने इसे 'परों को खोलते हुए' में क्यों बना रहने दिया? //

आदरणीया वन्दनाजी, यह एक बनाया हुआ शब्द है. किन्तु अर्थहीन शब्द कत्तई नहीं है.

मैं इसी शब्द को ’कहीं और’ क्यों रहने दिया तो इसपर इतना ही निवेदन करना चाहूँगा, जैसा मेंने कहा अभी, यह शब्द कोई अर्थहीनता नहीं ओढ़े बैठा है. ऐसे प्रयोग एक सीमा के अन्दर अज्ञेय जैसे लेखकों/कवियों ने खूब किये हैं. मैं उसी उन्नत अवस्था को ध्यान में रखे इस शब्द की सम्मोहिनी में आबद्ध रहा था... :-))

इस तरह की बातें, ओबीओ पर होती हैं और होते रहनी चाहिये. ओबीओ को मैं एक ऐसा सार्थक मंच मानता हूँ जहाँ किसी रचना से सम्बन्धित हर स्तर पर बातें होती हैं. और एक लेखक तथा पाठक के तौर पर हम संतुष्ट होने के क्रम में सकारात्मक बहस / चर्चा करते हैं.

सादर

Comment by Vindu Babu on December 20, 2013 at 6:43am

आदरणीय सौरभ सर:

यद्यपि आपसे इस बिंदु पर आंशिक चर्चा हो चुकी है पर जानना चाहूँगी आदरणीय की जब चैतन्यता कोई शब्द नहीं होता तो आपने इसे 'परों को खोलते हुए' में क्यों बना रहने दिया? यह शब्द मैंने ध्वज नामक रचना में प्रयोग किया है...अनजाने में।

सादर

Comment by Vindu Babu on December 20, 2013 at 6:32am

आदरणीय बृजेश सर:

आदरणीय सौरभ सर ने रचना को और स्पष्ट कर दिया,इसी परिपेक्ष में कुछ कहने के लिए कहा था आपसे,दूसरी बात आपतो सरलतम शब्दों में गहन बात प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं...इस रचना में आपने अपनी अन्य रचनाओं की अपेक्षा कठिन शब्दों का प्रयोग किया है,इस लिए भी कुछ कहने के लिए कहा था।

खैर...

आपको पुनः बधाई इस सुंदर रचना के लिए।

सादर

Comment by vandana on December 10, 2013 at 6:43am

 

फिर भी

अक्षरियों की हलचल से प्रस्फुटित

क्लिष्ट, जटिल शब्दाकृतियों का चेहरा

पिघला है-

व्युत्पन्न अदृश्य धारा के पदचिन्ह

शेष हैं अभी

 

सतर में अर्थ की तलाश है..............

बहुत खूबसूरत भाव आदरणीय बृजेश जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 1:44am

प्रस्तुत कविता के चार बन्द हैं. रचनाकर्म के चार विन्दुओं को अभिव्यक्त करते हुए से   --व्यथित भावों की दशा, आशान्वित मनस की अनवरत सकारात्मकता, यथार्थ के प्रकल्प का संभाव्य तथा अभीष्ट !

इन विन्दुओं की परिसीमा के अनुसार रचनाकर्म को बूझने का प्रयास करें तो इन चार विन्दुओं को आँकती हुई यह रचना रचनाकर्म की परिभाषा रचती हुई सी है.

प्रयोग सार्थक है.  बहुत खूब !

और.... यह चैतन्यता  कौन सा शब्द है, भाई ?

चेतन से चैतन्य हुआ यानि जो प्रखर रूप से सचेत हो, जिसका भाववाचक प्रारूप चेतनता है.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on December 6, 2013 at 6:20pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार! आप जैसी पाठक के होते, मैं स्वाम की रचना पर क्या कह सकता हूँ. अपने विचारों को शब्द देने का प्रयास किया है, आदरणीया, कोई त्रुटी हो तो अवगत कराएं!

सादर!

Comment by Vindu Babu on December 5, 2013 at 8:35am

शब्द से शब्द पर चोट....!

गहन रचना।

निवेदन है आप स्वयं रचना  के बारे में कुछ बताएं/कहें आदरणीय।

सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता ’अजेय’ जी, आपकी संलग्नता आश्वस्तिकारी है. आपका सोचना आपके पहलू से…"
1 hour ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"इस सारी चर्चा के बीच मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। जैसा कि हम सबने देख लिया कि सदस्य इस मंच के लिए…"
5 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जी आदरणीय "
5 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"आदरणीय अमिताजी, हार्दिक बधाइयाँ    प्रस्तुति में रचनात्मकता के साथ-साथ इसके प्रस्तुतीकरण…"
22 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post कुंडलिया
"आदरणीय सुरेश कल्याण जी, आपकी उपस्थिति के लिए हार्दिक धन्यवाद  छंद की अंतिम दोनों पंक्तियों की…"
23 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
"एक मार्मिक भावदशा को शाब्दिक करने का सार्थक प्रयास हुआ है, आदरणीया अमिता तिवारीजी. आप सतत अभ्यासरत…"
23 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"शुक्रिया आदरणीय सर जी। डाउनलोड करने की उस व्यवस्था में क्या हम अपने प्रोफाइल/ब्लॉग/पन्ने की पोस्ट्स…"
yesterday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अभी प्रश्न व्यय का ही नहीं सक्रियता और सहभागिता का है। पोर्टल का एक उद्देश्य है और अगर वही डगमगा…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जैसा कि ज्ञात हुआ है कि संचालन का व्यय प्रतिवर्ष 90 हज़ार रुपये आ रहा है। इस रकम को इतने लंबे समय तक…"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"लगभग 90 हजार प्रति वर्ष"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सादर नमस्कार और आदाब सम्मानित मंच। ओबीओ के वाट्सएप समूह से इस दुखद सूचना और यथोचित चर्चा की जानकारी…"
yesterday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय, ओ.बी.ओ. को बंद करने का निर्णय दुखद होने के साथ साथ संचालक मण्डल की मानसिक पराजय, थकान आदि…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service