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बताशा लगती हो तुम

बताशा लगती हो तुम

.

हिंदी के समान प्यारी, कोमल, सुरीली, मृदु,

घोले जो मिठास ऐसी भाषा लगती हो तुम,

जीवन में नीरसता, जैसे चहुँ ओर फैले,

तिमिर निराशाओं में आशा लगती हो तुम,

आँखें मूँद कर मृतप्राय हुए चित में यूँ,

सुंदर, सजग अभिलाषा लगती हो तुम,

नेह भरी देह का जो, रस पियूँ घोल-घोल,

चाशनी में डूबा सा बताशा लगती हो तुम।

----------------------------------- सुशील जोशी

“मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:13pm

टिप्पणी कर उत्साहवर्धन करने हेतु आपका अतिश: धन्यवाद आ0 शिज्जू भाई जी....

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:12pm

रचना को पसंद कर टिप्पणी देने हेतु सादर आभार आपका आ0 उमेश जी.....

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:12pm

बहुत बहुत धन्यवाद आपका आ0 लक्ष्मण प्रसाद जी......

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:11pm

आपकी टिप्पणी से मन प्रफुल्लित हो उठा है आ0 अन्नपूर्णा जी..... सादर आभार...

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:11pm

हिंदी में कितनी ताकत, कितना माधुर्य है..... यह आपकी टिप्पणी देखकर ही पता लग रहा है आ0 डॉ. गोपाल जी..... क्योंकि शायद इसी प्रस्तुति से आपने हिंदी में टिप्पणी देने की शुरुआत की है क्योंकि इससे पहले की आपकी टिप्पणियाँ Hinglish में थीं.......... तो फिर अपनी प्रेयसी को इससे कैसे अछूता रख सकता हूँ मैं...... हा..हा..हा....... आशीर्वचनों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका...

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 8:13pm

आपकी सार्थक टिप्पणी पाकर रचना भी सार्थक हुई आ0 गिरिराज जी.... हार्दिक धन्यवाद...

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 9, 2013 at 5:47pm

सुंदर शब्दों  से सुंदरता की तारीफ , बधाई सुशील भाई।

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 9, 2013 at 5:32pm

वाह आदरणीय सुशील भाई जी प्रियतमा के गुणों का वर्णन अलग अंदाज में क्या कहने बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 9, 2013 at 4:44pm

बहुत खूबसूरत रचना आदरणीय सुशीलजी दिलीदाद कुबूल करें

Comment by umesh katara on November 9, 2013 at 3:58pm

सुन्दर रचना है वाह्ह्ह् बधायी

कृपया ध्यान दे...

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