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मिट्टी का बर्तन..! ( अतुकांत )

सुन..! मेरे मिट्टी के बर्तन,

तू अपनी असलियत को पहचान

इस संसार की झूठी, खोखली वाहवाही से

परे रहना

अपनी गहराई से ज्यादा, अनुपयोगी द्रव्य को

मत सहेजना, ढुल जाता है..

 

इक दिन निकल गया मैं

किसी के कहने पर

इक नयी मिट्टी का बर्तन बनाने

उस मिटटी में सौंधी खुसबु,

रंग मेरी मिट्टी की ही तरह, साँवला

हुबहू.... मेरे जैसी ही मिट्टी

पर शायद तनिक, कंकरियां मिली थीं,

 

उससे न बना पाया,बर्तन

बनने से पहले ही

बिखर गया..टूट गया

मेरा मिट्टी का बर्तन...!

 

    जितेन्द्र ' गीत '

  

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 13, 2013 at 8:43am

आदरणीय शुशील जी, आपकी प्रतिक्रिया से लेखनकर्म को मनोबल मिला, आपका हृदय से आभार स्नेह व् मार्गदर्शन बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 11:51am

प्रतीकों के माध्यम से अच्छी भावाभिव्यक्ति है आ0 जितेन्द्र भाई जी..... केवल कुछ टंकण त्रुटियों के प्रति भी संवेदनशील होने की आवश्यकता है..... बहुत बहुत बधाई......

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:47am

आदरणीय सचिन जी, आपका बहुत बहुत आभार, स्नेह व् मार्गदर्शन बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:45am

आपका हृदय से आभार आदरणीय अरुण अनंत जी, आदरणीय बृजेश जी व् आप सभी रचनाकारों ने मुझे, लेखन के प्रति बहुत सहयोग, स्नेह व् मार्गदर्शन दिया, कृपया स्नेह मार्गदर्शन व् आशीर्वाद युहीं बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:40am

आदरणीया मीना दीदी, आपका बहुत बहुत आभार , स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:39am

आदरणीय लक्ष्मण जी, आपका बहुत बहुत आभार , ओ. बी. ओ. पर आदरणीया कुंती जी व् आप सभी रचनाकारों के स्नेह, मार्गदर्शन व् आशीर्वाद की हमेशा आवश्यकता रहेगी

सादर! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:30am

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय नीरज मिश्रा जी, स्नेह बनाये रखिये

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:29am

आदरणीय राम भाई जी, आपका बहुत बहुत आभार , स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 9:28am

आदरणीया कुंती जी, आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया, लेखन कर्म को बेहद मनोबल प्रदान करती है, आपका कहना एकदम सटीक है, बर्तन सृष्टी है, और कुम्हार ब्रह्मा. आपने रचना में कुम्हार की अपरिपक्वता को स्पष्ट कर, रचना पर अपने गहरे अनुभव का आशीर्वाद दिया है, रचना के माध्यम से मैं ऐसे कई कुम्हार जिन्होंने बेडोल( अनुशासनहीन) बर्तन बनाये है, और सारा दोष, मिट्टी पर  मढ दिया है, उन्ही के विषय में कहना चाह रहा हूँ, ऐसे बर्तनों को कुम्हार सिर्फ अपने ही उपयोग में ला सकता है, जिनकी खोखली वाहवाही होती है, 

आपने रचना के मर्म को छुआ, आपका हृदय से आभार, अपना स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Sachin Dev on November 6, 2013 at 6:55pm

आदरणीय भाई जीतेन्द्र गीत जी, अच्छी रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकारें ! 

कृपया ध्यान दे...

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