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दीप हमने सजाये घर-द्वार हैं  

फिर भी संचित अँधेरा होता रहा

मन अयोध्या बना व्याकुल सा सदा

तन ये लंका हुआ बस छलता रहा

 

राम को तो सदा ही वनवास है

मंथरा की कुटिलता जीती जहाँ

भाव  दशरथ दिखे बस लाचार से

खेल आसक्ति ऐसी खेले यहाँ

 

लोभ धर रूप कितने सम्मुख खड़ा

दंभ रावण के जैसा बढ़ता रहा

 

धुंध यूँ वासना की छाने लगी

मन में भ्रम इक पला, सीता को ठगा

नेह के बंध बिखरे, कमजोर हैं

सब्र शबरी का देता है अब दगा

 

अर्थ रिश्तों के आखिर बदलने लगे

शूल सुग्रीव के दिल में चुभता रहा

 

अर्थ जीवन को दें कुछ हम इस तरह 

द्वेष अब ना रहे इस संसार में 

रात काली अमावस की जो मिटे

सूर्य ऐसा उगे हर व्यवहार में

 

मन अयोध्या रहे तन हनुमान सा

भाव मन में यही बस पलता रहा 

              -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by Jyotirmai Pant on October 30, 2013 at 4:30pm

सुन्दर गीत .

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 30, 2013 at 9:31am

मन अयोध्या रहे तन हनुमान सा

भाव मन में यही बस पलता रहा  बहुत सुन्दर ! वाह ! मन अयोध्या रहे जहा राम राज्य, और तन हनुमान जिसमे भक्ति भाव 

                                          और जिसके दिल में बसते है श्री सीता राम | सुन्दर गीत रचना के लिए हार्दिक बधाई |

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:44pm

आदरणीय सुशील जी बहुत बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:43pm

आदरणीय रमेश जी बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:43pm

आदरणीय राम भाई बहुत बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:42pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:42pm

आदरणीय अरुण भाई आपका हार्दिक आभार! आपका अनुमोदन मेरे लिए संबल है!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:41pm

आदरणीय अखिलेश जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 29, 2013 at 10:40pm

आदरणीय आशुतोष जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Sushil.Joshi on October 29, 2013 at 10:11pm

भावों को सुंदर एवं सार्थक शब्दों में पिरोया है आपने आ0 बृजेश जी.... बहुत बहुत बधाई.....

कृपया ध्यान दे...

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