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वह माटी  थी पर नहीं थी वह  ...जिसे कुम्हार ने माजा चाक पे चढ़ाया, गढा, चमकाया बाजार  में बिठाया ... वह तो किस्मत की धनी थी पर वह ?  वह तो सिर्फ उसके बगिया की माटी  थी  उसके पैरों तले गाहे बगाहे आ जाती  ... कुचली जाती रही .. टूटती रही, खोदी जाती रही, तोडी जाती रही ..... और बदले में रंगबिरंगे फूलों से फलों से  अपनी हरियाली को सजा कर बगिया को महकाती रही .... यही तो था  उन् दोनों के अपने अपने हिस्से का आसमान .. लेकिन उन् दोनों के लिए एक आसमान से इतर एक दूसरा आसमान किसी बंद दरवाजे से बाहर भीतर खुलता था   .. एक वह जिसकी  चाहत थी टूट फूट कर बगिया की मिट्टी हो जाने की .. कैसे तोड़ता कुम्हार अपने शिल्प को जिसे गढा था उसने पुरजोर कोशिशों से अपनी रूह रख कर उस माटी में    .. और एक वह जो बगिया से बाहर  बाजार की चमक में दमकना चाहती थी एक आकार ले कर चाक में चढ़ना चाहती थी ...  कुन्हार कैसे करता उस माटी को बाजार में जिसकी खुशबू में वह जीता था ... आखिर कुम्हार की चाक बंद हो गयी, बगिया की देखभाल भी बंद हो गयी .. वह  कुम्हार दोनों के लिए न्याय गढते गढते मिट गया उन् दोनों पर ... और जल्द ही एक दिन खुद माटी हो गया ....  ...  उस दिन देखा था लोगो ने एक आसमान को टूट कर गिरते हुए ... उसके मेरे अभिप्राय में बिफरती माटी गुमनामी के अंधेरों में ख़ामोशी की तहों में सिमट गयी सदा के लिए ..........  ~nutan~

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Saurabh Pandey on October 5, 2013 at 10:53pm

वाह ! बहुत सुन्दर !

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 5, 2013 at 9:23pm

बहुत सुन्दर भाव ! शुभकामनाये 

Comment by Meena Pathak on October 5, 2013 at 7:51pm

आहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. बधाई आ० नूतन जी 

Comment by रविकर on October 5, 2013 at 5:59pm

गहन भाव-
आभार आदरेया-

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on October 5, 2013 at 4:49pm

बहुत  बहुत धन्यवाद आदरणीय माथुर जी और जोशी जी, मेरी इस रचना तक आने के लिए .. और खुशी हुई  कि यह रचना आपको अच्छी लगी .. 

Comment by Sushil.Joshi on October 5, 2013 at 2:13pm

बहुत सुंदर एवं भावनात्मक रचना.... हार्दिक बधाई हो आपको आदरणीया नूतन जी...

Comment by D P Mathur on October 5, 2013 at 11:59am

कैसे तोड़ता कुम्हार अपने शिल्प को जिसे गढा था उसने पुरजोर कोशिशों से अपनी रूह रख कर उस माटी में    .. 

आदरणीया डॉ नूतन जी नमस्कार, संवेदनाओं की गहराई में डूब कर लिखी रचना के लिए आपको बधाई । 

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