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चांदनी फिर पिघलने लगी है

चांदनी फिर पिघलने लगी है
आँसुओं से धुली वो इबारत

गीत बनकर मचलने लगी है।

रोते-रोते हुए पस्त शिशु से,

भावना के विहग सो गये थे
सांझ की डाल सहमी हुई थी,

भोर के पुष्प चुप हो गये थे
फिर अचानक हुई कोई हलचल,

जैसे लहरा गया कोई आंचल
उनके दिल से उठी एक बदली

मेरी छत पे टहलने लगी है।

इक गजल पर तरह दी किसी ने,

भूला मुखड़ा पुनः गुनगुनाया
प्यार से साज की धूल झाड़ी,

मुद्दतों बाद फिर से उठाया
तार छेड़ें अभी या न छेड़ें,

सुर सजायें या कुछ और ठहरें
मन की पंचायतों में इसीपे

कशमकश रोज़ चलने लगी है।

जिस्म ठंडा पड़ा था सुमन का,

कुछ हरारत सी आने लगी है
कब की मुरझा चुकी खुश्बुओं में,

जिन्दगी कुलबुलाने लगी है
गोद में तितलियों को उठाये,

झांक खिड़की से देखा हवा ने
खोल कर बेबसी के किवाड़े

फिर खुले में निकलने लगी है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 3:35pm

बहुत-बहुत धन्यवाद ! अरुण शर्मा ‘अनन्त’ जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 3:35pm

बहुत-बहुत धन्यवाद ! जवाहर लाल सिंह जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 3:34pm

बहुत-बहुत धन्यवाद ! भाई शरदिन्दु मुखर्जी जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 3:33pm

धन्यवाद ! जितेन्द्र ‘गीत’ जी !

Comment by Meena Pathak on August 5, 2013 at 2:23pm

बेहद खूबसूरत गीत, बधाई स्वीकारें 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 5, 2013 at 12:50pm

वाह बेहद सुन्दर गीत रचा है भाई पढ़कर मजा आ गया हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 10:28am

बहुत-बहुत धन्यवाद गीतिका वेदिका जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2013 at 10:27am

हार्दिक आभार बृजेश नीरज जी !

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 5, 2013 at 5:12am

बेहद खूबसूरत रचना!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on August 5, 2013 at 1:15am

//कब की मुरझा चुकी खुश्बुओं में,

जिन्दगी कुलबुलाने लगी है
गोद में तितलियों को उठाये,

झांक खिड़की से देखा हवा ने
खोल कर बेबसी के किवाड़े

फिर खुले में निकलने लगी है।//...अप्रतिम पंक्तियाँ....आनंद विभोर कर देने वाली, सौंदर्य से सराबोर रचना. इस आनंद दान के लिये हार्दिक आभार भाई सुलभ जी.

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