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चाह बस् इतना कि




चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में

चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे


चाह नही मुझे कि..
छेड़ो तुम  बंसी की तान और 
झूमती आऊँ मैं 


चाह नही कि..
बैठो तुम कदम्ब की डाल और
नाच के रिझाऊँ मैं 

चाह नही कि..
थामूं तुम्हारा हाथ और
निहारूँ तुम्हारी आँखों में


चाह बस इतनी कि..
हे नाथ !! 
छू लूँ तुम्हारे ‘पद पंकज’ और
हाथ हो तुम्हारा मेरे सिर पर ||


मौलिक / अप्रकाशित 

मीना पाठक 

Views: 896

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Comment by Meena Pathak on June 20, 2013 at 4:56pm

बहुत-बहुत  आभार राम शिरोमणि जी  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 20, 2013 at 3:02pm

मनभावन रचनाके  लिए हार्दिक बधायी स्वीकारें ..सादर 

Comment by बृजेश नीरज on June 19, 2013 at 11:01pm

बहुत सुन्दर! मेरी बधाई स्वीकारें!

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2013 at 10:00pm

 आदरणीया..मीना जी, सुन्दर रचना ...बधाई 

Comment by Kedia Chhirag on June 19, 2013 at 9:46am

भई वाह ,क्या बात है ......माशाअल्लाह ....बेहद खूबसूरत गुल ए ख्याल हैं ...... 

Comment by Meena Pathak on June 18, 2013 at 5:47pm

सादर आभार वर्मा जी 

Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2013 at 2:24pm

अतिसुन्दर और मनभावन प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  

Comment by Meena Pathak on June 18, 2013 at 12:09pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी ..माथुर जी और केवल प्रसाद जी आप सभी हार्दिक आभार 

Comment by Meena Pathak on June 18, 2013 at 12:05pm

सादर आभार कुंती जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 18, 2013 at 8:09am

आ0 मीना जी,    अतिसुन्दर और मनभावन प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर

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