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पतंग सा शोख मन
लिए चंचलता अपार
छूना चाहता है
पूरे नभ का विस्तार
पर्वत,सागर,अट्टालिकाएं
अनदेखी कर
सब बाधाएं
पग आगे ही आगे बढाएं

ज़िंदगी की थकान को
दूर करने के चाहिए
मन की पतंग
और सपनो का आस्मां
जिसमे मन भेर सके
बेहिचक,सतरंगी उड़ान

पर क्यों थमाएं डोर
पराये हाथों मैं
हर पल खौफ
रहे मन मैं
जाने कब कट जाएँ
कब लुट जाएँ

चंचलता,चपलता
लिए देखे मन
ज़िन्दगी के आईने
पर सच के धरातल
पर टिके कदम ही
देते ज़िंदगी को मायेने

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Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on May 20, 2010 at 12:50pm
पर क्यों थमाएं डोर
पराये हाथों मैं
हर पल खौफ
रहे मन मैं
जाने कब कट जाएँ
कब लुट जाएँ
bahut khub

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 19, 2010 at 11:36pm
ज़िंदगी की थकान को
दूर करने के चाहिए
मन की पतंग
और सपनो का आस्मां
जिसमे मन भेर सके
बेहिचक,सतरंगी उड़ान,
Bahut hi sunder kavita hai didi,aur bhi kavitawo ki tarah yey kavita bhi aap ki achhi hai, Dhanyabad didi,
Comment by Babita Gupta on May 19, 2010 at 12:22pm
Rajni didi, aap ki kavita mainey pahaley bhi open books par padhi hai, aap ki sabhi kavitayey aek sey badhkar aek hoti hai , yey kavita bhi wosi kadi ko badhaa rahi hai, Dhanyabad didi ,
Comment by aleem azmi on May 16, 2010 at 4:37pm
waah ji kamaal ki rachna hai mam aapto bahut lajawaab likhti hai ...bahut ummda
alfaaz kam hai aapke tareef ke liye ...likhte rahiye
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 16, 2010 at 4:34pm
पतंग सा शोख मन
लिए चंचलता अपार
छूना चाहता है
पूरे नभ का विस्तार
bahut bahut dhanyabaad didi itni acchi rachna humlogo ke beech post karne ke liye....
Comment by Kanchan Pandey on May 16, 2010 at 2:42pm
Waah Rajni didi waah aap ki kavita to bahut hi achhi hai, shabd saath nahi dey rahey hai ki mai taarif likhu, bahut hi achhi hai,
Comment by Admin on May 15, 2010 at 11:19pm
पर क्यों थमाएं डोर
पराये हाथों मैं
हर पल खौफ
रहे मन मैं
जाने कब कट जाएँ
कब लुट जाएँ

रजनी दिदी प्रणाम, एक बार फिर आप ने मन को छू लेने वाली कविता "मन की पतंग" प्रस्तुत किया है, मन को आपने पतंग की संज्ञा देकर सही ही किया है, पतंग मे जब तक डोर लगी रहती है वो नियंत्रण के साथ आकाश की उचाइयो को छूती रहती है और ज्योही पतंग की डोर हाथो से छुट जाती है तो पतंग अनियंत्रित होकर अपने अस्तित्व को खो देता है, शायद मन की भी स्थिति कुछ ऐसी ही है, जब तक मन मानव के नियंत्रण मे रहता है वो इंशान को इंशान बना कर रखता है और ज्योही मानव का मन से नियंत्रण हटा वो मानव को दानव बना देता है,बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, बहुत बहुत धन्यवाद,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 15, 2010 at 9:51pm
Hamesha hi ki tarah is baar bhi bahut sunder abhivyakti apki. Mera abhivaadan sweekar keejiye Rajni ji.

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