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गज़ल 

बह्र : 2122  1212  22 

जाल सैयाद नें बिछाया है 

कैद में सोन पंछी आया है..

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया है..

हारी बाज़ी पलट  सका वो ही 

संग गम के जो मुस्कुराया है..

रात का चैन खो गया तो क्या 

ख्वाब तो चाँद का सजाया है..

फाँसले क्या उसे मिटाएंगे

उसकी हस्ती में सच समाया है..

कसमसाता रहा जो बरसों से 

राज़ वो आज लब पे आया है..

ज़िंदगी इश्क में फना करके 

गीत उल्फत का गुनगुनाया है..

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Comment

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Comment by aman kumar on June 4, 2013 at 9:08am

हारी बाज़ी उसी नें पलटी है 

संग गम के जो मुस्कुराया है..

पूर्णता की बधाई !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 4, 2013 at 8:16am

वाह ! ये कब और कैसे !

आपकी इस सतत और चुपचाप कशिश पर हृदय से धन्यवाद कह रहा हूँ,  डॉ. प्राची. कोशिश वाकई गंभीर है. इस स्वतंत्र कोशिश पर हार्दिक बधाई

हारी बाज़ी उसी नें पलटी है 

संग गम के जो मुस्कुराया है... ... . इस शेर को दुरुस्त कर लें तो बेहतर. हुस्नेमतला न होते हुए भी उसका आभास या भ्रम दे रहा है. यह ग़ज़ल में ऐब माना जाता है.

सादर

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on June 4, 2013 at 1:49am

वाह वाह वाह क्या बात है,,,,,,,,, बधाई,,,,,,,,,,

Comment by वेदिका on June 4, 2013 at 12:37am

बहुत ही प्रभावकारी रचना आदरणीया प्राची जी!

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया है..

वाह ....शुभकामनायें 
Comment by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 12:00am
हारी बाजी उसी ने पलटी है,
संग गम के जो मुस्कुराया है!
वाह!

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