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ग़ज़ल -प्रेमिका के हाथ की तुरपाइयाँ !

ग़ज़ल :-

एक पर्वत और दस दस खाइयां |
हैं सतह पर सैकड़ों सच्चाइयां ।

हादसे द्योतक हैं बढ़ते ह्रास के ,
सभ्यता पर जम गयी हैं काइयाँ 

भाषणों में नेक नीयत के निबन्ध ,
आचरण में आड़ी तिरछी पाइयाँ 

मंदिरों के द्वार पर भिक्षुक कई ,
सच के चेहरे की उजागर झाइयाँ 

आते ही खिचड़ी के याद आये बहुत ,
माँ तेरे हाथों के लड्डू लाइयाँ 

कैरियर की फ़िक्र में माँ बाप हैं ,
पालती बच्चों को पन्ना धाइयाँ 

पल रहे फुटपाथ पर बच्चे हुजूर ,
कहते भी हैं जाको राखे साइयाँ 

शहर दिल्ली में लुटी एक दामिनी ,
आ गयीं सौ सामने  सच्चाइयां ।

ये सियासत थी कभी सेवा मियां ,
अब कहाँ पहले सी वो ऊचाइयां |

अब किसी रुमाल में मिलती नहीं ,
प्रेमिका के हाथ की तुरपाइयाँ |

आज जन जन के ह्रदय में राम हैं ,
भा गयीं तुलसी तेरी चौपाइयां ।

           (c) ABHINAV ARUN 

                  {01022013}

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on May 26, 2013 at 12:39pm

बहुत आभार आदरणीय। वेदिका जी ! शेर पसंद  लिखना सार्थक हुआ !!

Comment by वेदिका on May 25, 2013 at 11:30pm

सुंदर गज़ल  के लिए शुभकामनाये स्वीकारे आदरणीय अभिनव अरुण जी!

अब किसी रुमाल में मिलती नहीं ,
प्रेमिका के हाथ की तुड़पाइयां ।
 
अब तो हाईटेक जमाना आगया है जिसमे प्रेमी लोग अपनी प्रेमिका के चित्र वाली टी शर्ट पहनते है ...चाबी के छल्लों में उनके नाम लिखाते है ..और कुछ ज्यादा सहनशील प्रेमी टेटू गुदवा लेते है ..कहाँ ये तुरपाई अब देखने को मिलेगी 
वैसे मैंने भी अपने पति को चाय का ऐसा मग भेंट किया है जिसमे हम दोनों को तस्वीर है  
 
इस पवित्र भावना की गज़ल के लिए बधाई 

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