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पांच छत्तीस थे...घडी में जब...

शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी थी,

दूर तक साये चले आये थे... बीते मौसम को छोड़ने के लिए....

दर्द बहने लगा था पलकों से,

तुमने आँखों से उतारी थी...आंसुओं की नज़र..

ठंडी काफी में घुल गए थे जाने कितने पहर,

पांच छत्तीस हैं घडी में अब,

शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी है,

वक़्त गुज़रा है मगर,अब तलक नहीं बीता

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Comment by Sudhir Sharma on November 3, 2010 at 11:57pm
धन्यवाद गणेश जी.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2010 at 8:21pm
बहुत बढ़िया,सुधीर जी, एक अलग तरह की काव्य कृति है |
Comment by Sudhir Sharma on November 2, 2010 at 10:20pm
धन्यवाद नवीन जी..

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